कानपुर 
प्रख्यात कवि डॉ. विष्णु सक्सेना ने सीएए व एनआरसी को लेकर चल रहे देश में विरोध को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, देश या समाज नफरत से नहीं बल्कि मोहब्बत से चलता है। नफरत से सिर्फ बर्बादी होती है। इससे परिवार, समाज या देश नहीं चल सकता है। डॉ. विष्णु ने कहा कि इसी नफरत के दौर में मेरी ये पंक्तियां 'तपती हुई जमीन है जलधार बांटता हूं, पतझड़ के रास्ते पर मैं बहार बांटता हूं, ये आग का है दरिया जीना है बहुत मुश्किल, नफरत के दौर में भी मैं प्यार बांटता हूं...' लोगों को प्यार का पैगाम देती हैं। 

बिठूर महोत्सव में शिरकत करने आए डॉ. विष्णु सक्सेना ने आपके अपने अखबार हिन्दुस्तान से कवि, कविता और वर्तमान दौर को लेकर कई बातें साझा की। कहा, ये युग परिवर्तन का दौर चल रहा है इसलिए कवि और कविता में भी काफी बदलाव आ रहा है। अब कवि सम्मेलनों में कविता से अधिक कटाक्ष, फालतू की बातें अधिक रहती हैं। इससे युवा पीढ़ी को काफी नुकसान पहुंच रहा है। इस तरह के कवि सम्मेलन और कविता स्लो प्वाइजन की तरह हैं, जो धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहे हैं। 

उन्होंने कहा, हिन्दी के प्रति हो रही उपेक्षा के पीछे मुख्य कारण कांवेंट हैं। इस ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए। अपने ही देश में मातृभाषा हिन्दी बोलने पर जुर्माना लगता है। ऐसे में युवा पीढ़ी दिनकर, निराला, रसखान को कैसे पहचानेगी। किसी भी राष्ट्र को बम, गोली से तबाह नहीं किया जा सकता। जिस देश का कल्चर खत्म हो जाए, वह खुद तबाह हो जाएगा।

डॉ. विष्णु सक्सेना ने कहा कि बॉलीवुड में अब कवियों का वह सम्मान नहीं रह गया है। पहले राजकपूर अलीगढ़ से नीरज को बुलाते थे और अब कवि अपनी कविता लेकर निर्देशकों के चक्कर काटते हैं। पहले गीत के आधार पर म्यूजिक बनता है और म्यूजिक पर गीत के बोल भरे जाते हैं।

वर्तमान में बॉलीवुड गीतों की आत्मा खत्म हो गई है। तभी पुराने गीत अब भी जिंदा हैं और नए गीत कुछ माह में ही भूले-बिसरे हो जाते हैं। 'आसमां छू लो अगर, तो तुम भूल मत जाना, ये हिंडोला गुरूर का है, झूल मत जाता, करो भला जो किसा का, तो याद मत रखना, करें तुम्हारा भला, तो उसे भूल मत जाना...'।

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