नई दिल्ली 
भारत-अमेरिका में बढ़ते सामंजस्य से चीन घबरा रहा है। वहां की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में इस बात की पुष्टि हो रही है। इस लेख में 'एशिया की सदी' का सपना सच करने की दुहाई देते हुए भारत को चीन से दोस्ती करने की सलाह दी गई है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में फ्रांस से आगे निकलने और दुनिया की चौथी बड़ी सैन्य ताकत के रूप में भारत की पहचान करते हुए यह लेख कहता है कि भले ही चीने के साथ इसके कुछ असहमतियां हों, लेकिन सहमतियों की गुंजाइश ज्यादा महत्वपूर्ण है।  
 

लेख कहता में कहा गया है, 'अमेरिका, भारत-चीन दोनों देशों पर 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत दबाव बना रहा है और बलप्रयोग एवं पाबंदियों की उसकी नई व्यापार नीति दोनों देशों को और नजदीक ला रही है। दोनों देश जितनी जल्दी एक-दूसरे के करीब आएंगे, उतनी जल्दी एशिया की सदी की सचाई मूर्त रूप ले लेगी।' ग्लोबल टाइम्स में यह लेख वॉशिंगटन स्टेट नेटवर्क फॉर ह्यूमन राइट्स तथा सेंट्रल वॉशिंगटन कॉलिसन फॉर सोशल जस्टिस के चेयरमैन ने लिखा है। 

लेख कहता है, 'जीडीपी के मामले में भारत अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और यूके के बाद छठे पायदान पर आ गया है। जल्द ही यह यूके को पछाड़कर पांचवें पायदान पर होगा। हालांकि, जीडीपी हमें पूर्ण सत्य का पता नहीं चलता। पर्चेंजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) जमीनी हकीकत के ज्यादा करीब है। अगर हम पीपीपी पर गौर करें तो इन देशों का क्रम बदल जाएगा और पूरी संभावना है कि चीन पहले, अमेरिका दूसरे जबकि भारत तीसरे स्थान पर होगा।' 

लेखक कहता है, 'अगर हम जीडीपी को आर्थिक हैसियत का एकमात्र पैमाना मानें तो भी चीजें जल्द ही बदलने वाली हैं। मुझे लगता है कि 2030 तक चीन का क्रम पहला, अमेरिका का दूसरा और भारत का क्रम तीसरा होने की पूरी संभावना है। वहीं, 2050 तक चीन पहले, भारत दूसरे और अमेरिका तीसरे स्थान पर हो सकता है। आज नहीं तो कल दुनिया महसूस करेगी ही कि एशिया की सदी का आगाज हो चुका है।' 

इसमें कहा गया है कि दुनियाभर में यह धारणा प्रबल हो रही है कि भारत अपनी पारंपरिक निर्गुट नीति का त्याग करते हुए अमेरिका की तरफ झुक रहा है। इससे पंचशील (सहअस्तित्व के पांच सिद्धातों) की भावना को आघात लगा है। लेख में कहा गया है कि भारत के प्रति यह धारणा न उसके लिए और न ही शेष विश्व के लिए सही है। लेख कहता है, 'भारतीय रक्षा एवं विदेश मंत्रियों का अपने अमेरिकी समकक्षों के साथ दो जमा दो (2+2) मुलाकात से इस धारणा को और भी बल मिला है कि अमेरिका के प्रति भारत का झुकाव जारी है।' 

लेख कहता है, 'भारत को यह धारणा खत्म करने पर और अधिक काम करना होगा कि यह चीन को साधने के लिए अमेरिका के बताए रास्ते पर चल रहा है। यह हकीकत है कि चीन के साथ उसके कुछ मतभेद हैं, खासकर सीमा विवाद। हालांकि, नई दिल्ली को यह समझना चाहिए कि सीमा विवाद मुख्य रूप से उपनिवेशवाद की देन है न कि चीन द्वारा पैदा किया गया। कई क्षेत्रों में भारत और चीन के साझे हित हैं।' 

लेख में कहा गया है कि सबसे पहले चीन ने माना था कि 21वीं सदी एशिया की सदी होगी। भारत को यह स्वीकार करने में बहुत वक्त लग गया कि शक्ति संतुलन पूरब में आ चुका है और एशिया अब दुनिया का नेतृत्व करने वाला क्षेत्र बन गया है जो दो सदी पहले यूरोप और अमेरिका हुआ करता था। यह स्वागतयोग्य संकेत है कि भारत पश्चिम के प्रति अपने झुकाव में सुधार लाने की कोशिश कर रहा है जो सोवियत यूनियन के विध्वंस के बाद विकसित हुआ था। 

लेख में आगे कहा गया है कि चीन के मैन्युफैक्चरिंग हब और वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन बनने की बदौलत भारत ने वैश्विक हकीकतों के प्रति अपनी धारणा बदली और इसने एक तरह से खुद की क्षमता पर भरोसा करते हुए एक विश्व शक्ति होने का दावा कर सका क्योंकि एक एशियाई और एक गैर-पश्चिमी देश भी दुनिया की नेतृत्व शक्ति बन सकता है। इस तरह से चीन ने भारत को आत्मविश्वास और आत्मसम्मान हासिल करने में मदद की। हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारत अपनी लुक ईस्ट पॉलिसी (पूरब की ओर देखो) को मजबूत करता रहेगा और चीन के साथ साझे हित के कुछ और क्षेत्र ढूंढेगा ताकि एशिया के दो सबसे बड़े देश दुनिया में एक नए युग का सूत्रपात करने में मिलकर काम कर सकें। 

लेख कहता है, 'यह बहुत अच्छा बदलाव है कि चीन भारत के उद्भव को सकारात्मक नजरिए से देख रहा है। भारत को भी एशिया की सदी में चीन को साझेदार ज्यादा और प्रतिद्वंद्वी कम मानना चाहिए। दोनों देश मिलकर दुनिया को यह संदेश दे सकते हैं कि पश्चिमी दबदबे की दुनिया से इतर एशिया की सदी में एशिया का दबदबा और इसकी दादागीरी नहीं होगी, बल्कि यह किसी एक देश, क्षेत्र, नस्ल, रंग, धर्म या दर्शन के दबदबे और दादागीरी का अंत होगा। देशों, क्षेत्रों, नस्लों, रंगों और धर्मों के बीच के रिश्ते समानता, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित होंगे। दुनिया को ये सिद्धांत पंचशील के जरिए दिए गए थे जिसका भारत और चीन ने मिलकर प्रतिपादन किया था। हमें आज फिर से पंचशील की मूल भावना को जीवित करना चाहिए।' 
 

Source : Agency