संयुक्त राष्ट्र 

भारत ने जलावायु परिवर्तन से बचाव के काम में विकसित औद्योगिक देशों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि जिन देशों ने अपनी तत्काल जरूरतों के लिए विगत में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है, वे अब अपनी जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकते। भारत ने यह भी कहा है कि गरीब व कमजोर देशों को उनकी स्थिति से उबारने के लिए उन्हें विकसित राष्ट्रों से धन एवं प्रौद्योगिकी मिलनी ही चाहिए।  
 

संयुक्त राष्ट्र महासभा की 73वीं बैठक में सामान्य चर्चा के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा नुकसान अल्पविकसित और विकासशील देशों को हुआ है। साथ ही बड़ी मुश्किल यह है कि इस संकट से निपटने के लिए उनके पास संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का अभाव है। उन्होंने कहा, 'हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद है, जो हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बन गई हैं।' 

स्वराज ने कहा, 'जिन देशों ने अपनी तत्काल जरूरतों के लिए प्रकृति का दोहन किया है, वे इस समय अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से यदि हमें दुनिया को बचाना है तो विकसित राष्ट्रों को गरीब एवं कमजोर देशों के उद्धार के लिए वित्तीय और प्रौद्योगिकी संसाधनों की मदद करनी चाहिए।' उन्होंने जलवायु परिवर्तन के मुकाबले के लिए दुनिया की साझा और देशों की अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत पर बल देते हुए कहा कि यह सिद्धांत 2015 के पैरिस समझौते में दोहराया गया है। 

स्वराज ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए भारत ने आगे बढ़कर काम किया है। स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के लिए भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय सौर संधि (आईएसए) की शुरुआत की है। इसका मकसद 121 उष्णकटिबंधीय देशों में सौर ऊर्जा का प्रसार करना है। स्वराज ने कहा कि आईएसए में अब तक 68 देश जुड़ चुके हैं। 

मार्च में भारत और फ्रांस ने आईएसए का संस्थापना सम्मेलन आयोजित किया था। इसमें 120 देशों ने भाग लिया था। स्वराज ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रों को इसके लिए इसी हफ्ते संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष पर्यावरण पुरस्कार 'चैंपियन ऑफ द अर्थ अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक भारत को केवल एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक के सामानों से मुक्त करने का अभूतपूर्व लक्ष्य रखा है। 

स्वराज ने कहा, 'हमारे प्रधानमंत्री ने ‘एक सूर्य, एक ग्रिड’ के सूक्त वाक्य में सतत एवं उपलब्ध ऊर्जा के बारे में अपने विचारों को परिभाषित किया है। यह एक अवधारणा हमारी समस्या का वह समाधान बन सकती है, जिसकी हमें तलाश है ।' इस हफ्ते की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतरेस की अध्यक्षता में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बैठक हुई। स्वराज ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर काम करने के लिए भारत आगे बढ़ने को तैयार है। जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रतिबद्धता भारत के विचारों की जड़ों तक व्याप्त है जो प्रकृति को मां का दर्जा देता है। 

भारत ने 2022 तक 1,75,000 मेगा वॉट सौर एवं पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। बिजली को बचाने के लिए 30 करोड़ एलईडी बल्ब लगाए हैं, जिससे 4,000 मेगावॉट बिजली की बचत हो रही है। धन के रूप में यह बचत दो अरब डॉलर की है। उन्होंने इसी संदर्भ में केरल के कोच्चि हवाईअड्डे का भी उदाहरण दिया, जो दुनिया का पहला पूर्णत: सौर ऊर्जा चालित हवाईअड्डा है।
 

Source : Agency