करवा चौथ का व्रत भारतीय महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति और अपने पति की लंबी उम्र की कामना के लिए व्रत करती हैं। हालांकि सामाजिक मान्यताएं कहती हैं कि इस व्रत का चलन पंजाबी परंपराओं से लिया गया है। लेकिन इस व्रत से जुड़ी धार्मिक कथाएं कुछ और कहती हैं। आइए, जानते हैं कि करवा चौथ का व्रत पूरे ब्रह्मांड में सबसे पहले किसने किया…

प्राचीन समय में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थी। वह अपने पति के साथ नदी किनारे बसे एक गांव में रहती थी। उसका पति काफी उम्रदराज था। एक दिन वह नदी में स्नान करने गया। नदी में नहाते समय एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और निगलने के लिए उसे अपनी तरफ खींचने लगा। इस पर वह अपनी पत्नी का नाम लेकर ‘करवा करवा’ चिल्लाकर अपनी पत्नी को सहायता के लिए पुकारने लगा। करवा पतिव्रता स्त्री थी और उसके सतीत्व में बहुत बल था। जैसे ही उसने अपने पति की आवाज सुनी, करवा दौड़कर अपने पति के पास पहुंची। उसने अपने पति का पैर मगर के मुंह में देखकर अपनी सूती साड़ी से एक धागा निकाला और अपने तपोबल से आन देखर उस मगरमच्छ को कच्चे धागे से ही बांध दिया।

मगरमच्छ को उस सूत के धागे से बांधने के बाद करवा यमराज के पास पहुंची। यमराज उस समय भगवान चित्रगुप्त के खाते देख रहे थे। करवा अपने हाथ में लाई हुई सात सीकों को झाड़ने लगी। इससे यमराज के खाते इधर-उधर बिखर गए। उनका ध्यान करवा पर पड़ा। यमराज ने रुष्ट होते हुए पूछा ‘देवी तुम क्या चाहती हो?’ इस पर करवा ने कहा कि यमराज एक मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है, आप अपनी शक्ति से उस मगर को मृत्युदंड देखकर अपने लोक नरक में ले जाओ। इस पर यमराज ने कहा कि मगरमच्छ की आयु अभी शेष है, समय से पहले मैं उसे मृत्यु नहीं दे सकता। इस पर करवा ने कहा ‘यदि आप मगरमच्छ को मारकर, मेरे पति को चिरायु होने का वरदान नहीं देगें तो मैं अपने तपोबल से आपको नष्ट होने का शाप दूंगी।’


करवा की बात सुनकर चित्रगुप्त सोच में पड़ गए। क्योंकि वह करवा के सतीत्व के कारण न तो उसे शाप दे सकते थे और न ही उसके वचन को अनदेखा कर सकते थे। तब उन्होंने मगरमच्छ को असमय ही यमलोक भेज दिया और करवा के पति को लंबी आयु का वरदान दिया। साथ ही चित्रगुप्त ने करवा को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा जीवन सुख और समृद्धि से भरपूर होगा। हे करवा! आज तुमने अपने पति के जीवन की रक्षा अपने तपोबल से की है, मैं वरदान देता हू कि इस तिथि पर जो भी महिला पूर्ण विश्वास और आस्था से व्रत और पूजन करेगी, मैं उसके सौभाग्य की रक्षा करूंगा।

करवा के तप के कारण भगवान चित्रगुप्त ने सौभाग्य की रक्षा का आशीर्वाद दिया और उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (चौथ) तिथि होने कारण, करवा और चौथ के मिलने से इस व्रत का नाम करवा चौथ पड़ा। इस तरह मां करवा वह पहली महिला हैं, जिन्होंने सुहाग की रक्षा के इस व्रत को न केवल पहली बार किया बल्कि इसकी शुरुआत भी की। इस व्रत को करने के बाद शाम को पूजा करते समय माता करवा की यह कथा पढ़ें। साथ ही माता करवा से विनती करें कि हे मां करवा जिस प्रकार आपने अपने सुहाग और सौभाग्य की रक्षा की, उसी तरह हमारे सुहाग की रक्षा करना। भगवान चित्रगुप्त और यमराज से विनती करें कि हे प्रभु जो वचन आपने माता करवा को दिया था, उसका निर्वाह करते हुए हमारे व्रत को स्वीकार कर हमारे सौभाग्य की रक्षा करना।

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर दौपदी ने अर्जुन के लिए करवाचौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के बारे में वराह पुराण में उल्लेख मिलता है।

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