जयपुर 
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए मध्य प्रदेश के मालवा की जो अहमियत है, कुछ वही उम्मीद उसे राजस्थान के मेवाड़ या उदयपुर डिविजन से भी है। दरअसल, 2013 के विधानसभा चुनाव के वक्त लगी सियासी झाड़ू ने मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार सुनिश्चित कर दी थी। कुछ इसी तर्ज पर मेवाड़ में बीजेपी ने मुकाबले को अपने नाम किया तो राजस्थान की सत्ता ही खाते में आ गई। इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए इस बार बीजेपी मेवाड़ में अपना समर्थन बरकरार रखने की कोशिश कर रही है।  

कहा जाता है कि जो मेवाड़ में जीत हासिल करता है, राजस्थान में भी विजय पताका उसी की लहराती है। बांसवाड़ा जिले से कांग्रेस के प्रवक्ता विकेश जैन कहते हैं, 'मेवाड़ हमेशा एक तरफा जाता है और राजस्थान में बहुमत पाने के लिए एक पार्टी का नेतृत्व करता है।' वर्ष 2013 में उदयपुर डिविजन की 28 सीटों में से बीजेपी ने 25 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ दो सीटें ही आई थीं। एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के नाम रही। वर्ष 2008 में कांग्रेस ने 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी और बीजेपी को 6 पर जीत मिली। दो सीटें अन्य के नाम रहीं। जैन बताते हैं, 'राजस्थान में सात डिविजन हैं। यदि कोई पार्टी उदयपुर डिविजन में पूरा मुकाबला अपने नाम करते हुए 20 के आसपास सीटें हासिल करती है और 6 डिविजन में मुकाबला बराबरी का भी रहता है तो उसके लिए बहुमत का आंकड़ा 101 को छूने में आसानी हो जाती है।' 

भील वर्ग की 90 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी 

मेवाड़ में बदलाव के लिए शोर हर बार जोरदार होता है और इसका एक प्रमुख कारण वहां की आदिवासी जनसंख्या है। उदय डिविजन के तकरीबन 70 फीसदी लोग आदिवासी हैं, इनका असर 16 सीटों पर दिखता है, जो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। आदिवासी जनसंख्या में मुख्य भील वर्ग है। इनकी विभिन्न जनजातियों में हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा की है। इनके बाद मीना जनजाति की हिस्सेदारी सबसे अधिक मानी जाती है। 

"हम हर बार सरकार द्वारा किए गए वादों के आधार पर मतदान करने जाते हैं, जब उन्हें पूरा नहीं किया जाता तो हम वोट बदलाव के लिए करते हैं। यह हमारा इतिहास है।"
-दीपक कुमार, स्थानीय

'काम किया लेकिन ज्यादा की थी उम्मीद'
 विधानसभा सीट के अंतर्गत आने वाले सतिरामपुर गांव के दीपक कुमार (28) बताते हैं, 'हम हर बार सरकार द्वारा किए गए वादों के आधार पर मतदान करने जाते हैं, जब उन्हें पूरा नहीं किया जाता तो हम वोट बदलाव के लिए करते हैं। यह हमारा इतिहास है।' दीपक कुमार ने सरकारी शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे हैं और वह वर्तमान की सरकार से नाखुश हैं। वह यह भी कहते हैं, 'काम किया गया है लेकिन हमें ज्यादा की उम्मीद थी।' हालांकि, वह किस पार्टी को मतदान करेंगे इस सवाल को टालते हुए उन्होंने हवा के रुख की ओर इशारा किया। 

वीएचपी के 200 स्कूलों में हजारों छात्र 

पिछले कई दशकों से यहां पर विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) विभिन्न जनजातियों के लिए जमीनी कार्य करने में जुटा हुआ है। वीएचपी इन क्षेत्रों में लगभग 200 विद्या निकेतन और सबरी विद्यालय संचालित करता है, जहां पर 50 हजार से 60 हजार छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं। बीजेपी के बांसवाड़ा जिला पंचायत प्रभारी कमलेश तंबोलिया कहते हैं, '90 फीसदी छात्र आदिवासी हैं।' बता दें कि तंबोलिया इससे पहले बजरंग दल से जुड़े हुए थे। 

Source : Agency