नई दिल्ली  
   
देश में अगले कुछ महीनों में होने वाले आम चुनावों के लिए दो मुख्य सियासी पार्टियां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) कमर कस चुकी हैं. ये दोनों दल हर रोज आम जनता को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए नए-नए वादे और क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन कर रहे हैं. लेकिन इन दोनों दोलों को अपने पुराने सहयोगी दलों के साथ रिश्तों में खटास भी देखी जा रही है. कर्नाटक में कांग्रेस का जनता दल (सेक्युलर) और बीजेपी का महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ रिश्ते को लेकर सब कुछ ठीक नहीं है.

आगामी आम चुनावों में मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए कांग्रेस ने बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी सहित अन्य कई दलों के साथ महागबंधन बनाया. महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और कांग्रेस के साथ गठबंधन को लगभग अंतिम रूप दिया जा चुका है. बस औपचारिक तौर पर घोषणा होनी बाकी है. लेकिन उसे कर्नाटक में जेडीएस के साथ रिश्तों को लेकर तल्खी का सामना करना पड़ रहा है. सोमवार को तो नौबत यहां तक आ गई कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी बोल पड़े कि, 'वह पद छोड़ने के लिए तैयार हैं, कांग्रेस के विधायक अपनी सीमा लांघ रहे हैं. कांग्रेस नेताओं को अपने विधायकों को कंट्रोल करना चाहिए.' कर्नाटक में पूरा विवाद कैबिनेट में और लोगों को शामिल किए जाने को लेकर विवाद चल रहा हैय

नाराजगी जो आ गई सतह पर

असल में, कांग्रेस के कुछ विधायकों ने कहा था कि उनके नेता कुमारस्वामी नहीं बल्कि कांग्रेस के सिद्धारमैया हैं. जिससे एचडी कुमारस्वामी नाराज थे. कुमारस्वामी ने कहा कि कांग्रेस को इन सभी मुद्दों को देखना चाहिए, अगर वो ये सब जारी रखना चाहते हैं तो मैं पद छोड़ने के लिए तैयार हूं. यह कोई पहला मौका नहीं जब उन्हें अपना दर्द साझा करना पड़ा है. वह पहले भी इस तरह से बयान दे चुके हैं. कहा गया कि जेडीएस और कांग्रेस में इसी खींचतान के बीच बीजेपी ने कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस चलाने का प्रयास किया.

हालांकि कांग्रेस के नेता शाहनवाज आलम जेडीएस और कांग्रेस में किसी खटास की बात को खारिज करते हैं. उनका कहना है कि बीजेपी लोकतंत्र को पंसद नहीं है. वह लोकतंत्र की हत्या करना चाहती है. इसलिए जिन राज्यों में बीजेपी बहुमत के करीब है, वहां जोड़तोड़ करके कांग्रेस की सरकारों को अस्थिर करना चाहती है. चाहे वो कर्नाटक हो, मध्य प्रदेश हो या फिर गोवा. बहरहाल कांग्रेस भले ही पुराने सहयोगी दलों से खटास की बात से इनकार कर रही है, लेकिन इनके बीच तल्खी सामने आ ही जा रही है. क्योंकि महागठबंधन फॉर्मूले से बनी कर्नाटक की कांग्रेस और जेडीएस सरकार के बीच अक्सर विवाद सतह पर आ जा रहे हैं.

बीजेपी को आंख दिखाते सहयोगी

वहीं, बीजेपी को भी अपने पुराने सहयोगी दलों से नाराजगी झेलनी पड़ रही है. महाराष्ट्र शिवसेना हो या उत्तर प्रदेश में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर हों या अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल, जब तब ये दल बीजेपी को आंख दिखाते ही रहते हैं. एनडीए में रहे और मोदी सरकार में मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) पहले ही बीजेपी का साथ छोड़ चुकी है. अब बीजेपी को बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू का ही साथ बचा है.  

महाराष्ट्र में तो तल्खी इतनी बढ़ चुकी है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी और शिवसेना में खुद को बड़ा भाई साबित करने की जंग छिड़ गई है. सोमवार को शिवसेना की बैठक हुई. इसमें यही संकेत मिले कि शिवसेना अपनी बात से पीछे हटने वाली नहीं है. शिवसेना नेता संजय राउत का कहना है, 'महाराष्ट्र में शिवसेना ही बड़े भाई का रोल अदा करेगी. हमें बीजेपी का 50-50 फॉर्मूला मंजूर नहीं है.'

इसी बैठक में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने सांसदों को नसीहत दी कि वह राफेल विमान सौदे का मुद्दा जोर-शोर से उठाते रहें. वे राफेल डील को लेकर जेपीसी की मांग को संसद में उठाते रहे. शिवसेना के इसी रवैये पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि हम गठबंधन के लिए उतावले नहीं हैं. इन दोनों बयानों के आइने में देखें इनके रिश्तों को साफ-साफ देखा जा सकता है. असल में शिवसेना केंद्र और महाराष्ट्र सरकार में बीजेपी की सहयोगी है और वह चाहती है कि उसे ज्यादा तरजीह दी जाए लेकिन देवेंद्र फडणवीस की बातों से लगता है कि बीजेपी इसके मूड में नहीं है.

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