मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकारी स्कूलों की सेहत सुधारने के लिए जिस अभिनव पहल को चला रहे हैं, उसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। देश में पहली बार किसी मुख्यमंत्री को सरकारी स्कूलों के बच्चों ने अपने बीच पाकर नि:संदेह खुशी पाई होगी। अन्य राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों को शिवराज के इस प्रयास से सबक सीखने की जरूरत है। एक मुख्यमंत्री छात्रों को अपने जीवन के अनुभव सुनाकर उन्हें शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करे इससे बढ़कर अच्छी पहल और क्या हो सकती है। इसलिए मिल बांचे कार्यक्रम सरकारी स्कलों की चौपट व्यवस्था की कुछ तो हिम्मत बढ़ाएगा। वरना सरकारी स्कूलों से अभिभावकों का पेट सालों पहले भर चुका है। वहीं अभिभावक अपने बच्चों को शासकीय स्कूलों में दाखिला दिलाते हैं जो निजी स्कूलों की फीस नहीं भर सकते या फिर उस क्षेत्र में कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है।

विकल्पहीनता और निजी स्कूलों की महंगी फीस दोनों देश की शैक्षणिक व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं। सबसे ज्यादा  गंभीर चिंता की बात सरकारी स्कूलों को लेकर है क्योंकि इनकी हालत काफी दयनीय है। जहां स्कूल भवन हैं, वहां गुरुजी नहीं हैं। जहां गुरुजी हैं, वहां स्कूल भवन नहीं है और जहां ये दोनों हैं वहां छात्र पढ़ने को राजी नहीं हैं। ऐसे में शिक्षा तंत्र का मटियामेट होने के सिवाए क्या रह जाता है। इसी बात का फायदा निजी स्कूलों के मालिकों को हो रहा है। शिक्षा आज मुनाफे का सबसे बड़ा व्यापार हो गया है। दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आजादी के 71 साल बाद भी हम सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधार पाए। पूंजीपतियों ने शैक्षणिक प्रतिष्ठानों का ऐसा जाल बुन लिया है कि उसमें सब को फंसना ही है। सरकारी स्कूलों की शैेक्षणिक गुणवत्ता को बढ़ाने या फिर उसे प्रोत्साहित करने के लिए निर्णायक प्रयास कभी नहीं हुए। मध्यप्रदेश में आज करीब 50 हजार शिक्षकों के पद सरकारी स्कूलों में सालों से रिक्त हैं। उन्हें भरने के लिए सरकार के पास फंड नहीं है। निजी स्कूलों ने सरकारी स्कूलों या यूं कहें कि शिक्षा तंत्र को जहरीले डायनासौर की तरह अपने जबड़े में जकड़ रखा है। 

अंग्रेजी पढ़ाने की हमारी जिद बच्चों के संस्कार को नष्ट कर रही है। निजी स्कूलों के फीस निर्धारण का कोई तय पैमाना न होने से बेचारे अभिभावक फीस दे देकर मरे जा रहे हैं। देश में शायद ही कोई आईएएस, आईपीएस, नेता या माननीय मंत्री-विधायक होंगे जो अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हों। मेरे दो बेटे भी प्रायवेट स्कूल में पढ़ते हैं। जिनकी मोटी फीस मैं चुकाने को विवश हूं। निजी स्कूलों के मालिक भी ज्यादातर अफसर या फिर नेता होते हैं। तो फिर उनकी मनमानी पर चाबुक चलाने की हिम्मत किसमें होगी? सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार के नैतिक प्रयासों की आज सख्त आवश्कता है। देश के वरिष्ठ मंत्री प्रकाश जावड़ेकर खुद इस बात को मानते हैं कि मिड-डे मील के लिए बच्चे स्कूल जाते हैं। केन्द्रीय मंत्री का यह कथन हमारी सरकारों की कथनी और करनी समझने के लिए पर्याप्त है। विश्व बैंक से सालाना हजारों करोड़ रुपए साक्षरता और स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए सरकारें खर्च करती हैं। मगर सेहत सुधरने की बजाय कोमा की हालत में है। सर्व शिक्षा अभियान में हजारों करोड़ के घोटाले देशभर में सामने आते रहते हैं। मध्यप्रदेश में मिड-डे मील यानि स्कूलों में बच्चों को मिलने वाला भोजन कितना घटिया और जानलेवा साबित हुआ मगर मासूमों का निवाला निगलने वाले जहरीले सर्प आजाद हैं। इस ओर भी मुख्यमंत्री को ठोस कदम उठाने चाहिए थे मगर नहीं हो सका। मैं निजी स्कूलों का विरोधी नहीं हूं, इसलिए  यह बता दूं कि सरस्वती शिशु मंदिर जैसे शैक्षणिक संस्थान अभी भी हमारी लाज बचाए हुए हैं।

कहने को महर्षि विद्या मंदिर भी हैं मगर उनकी फीस आम आदमी वहन नहीं कर सकता। लिहाजा सरस्वती शिशु मंदिर जैसे सस्ते किन्तु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मंदिरों को प्रोत्साहित करने से निजी स्कूलों की मनमानी पर चाबुक चलाया जा सकता है। कई और भी निजी स्कूल हैं, जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें भी प्रोत्साहन मिले। संस्कार और शिष्टाचार की शिक्षा यदि कहीं मिलती है तो सरस्वती शिशु मंदिर इस मामले में उत्कृष्ट हैं। केवल अंग्रेजी माध्यम से बच्चे का भाग्य नहीं बदलेगा। हिन्दी का भी ध्यान रखना होगा। शिक्षा पद्धति समय के साथ बदलनी चाहिए मैं इसका समर्थक हूं। मगर इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने बच्चों को यह न समझा पाएं कि संस्कार क्या होते हैं?  सरकारी स्कूलों को सुधार की आवश्कता है और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकतीं तो उन्हें बंद कर दिया जाए।

Source : विजय शुक्ला