पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों में चीख हरगिज कारगर होगी नहीं।

आज यदि महान कालजयी कवि दुष्यंत कुमार जीवित होते तो उनकी कलम ऐसी ही कविताओं से आग उगल रही होती। दुष्यंत कुमार की ये पक्तियां वर्तमान परिस्थितियों पर मौजूं लग रही हैं। देश का मिजाज इनदिनों काफी गरम है। केन्द्र सरकार की नोटबंदी का दर्द जनता किसी तरह से सहकर काम चला रही थी कि करों का रोग एक बीमारी बनकर व्यापारियों को खून के आंसू रुला रहा है। उस कमबख्त बीमारी का नाम है जीएसटी। केन्द्र सरकार की भाषा में जीएसटी का मतलब है गुड्स एंड सर्विस टैक्स, जिसके बारे में हमारे सबसे चर्चित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साहब कहते हैं- एक देश, एक कर। इसके आगे मैं जोड़ता हूं- चाहे मर। जीएसटी ने देश की अर्थ -व्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचाया है। आर्थिक दृष्टि पर इसका गहरा असर पड़ा है। वैसे अखबारों को इतना कड़वा सच लिखने की इनदिनों अघोषित रूप से सख्त मनाही है, मगर हम जैसे फक्कड़ मिजाज वाले इन बातों से कभी नहीं घबराते। और जब पूरा देश बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से कराह रहा हो, तब हमारी कलम में बहने वाली स्याही का उबाल स्वाभाविक है। 2014 के आम चुनाव में गुजराती मोटा भाई नरेन्द्र मोदी पर आंख मूंदकर हमने भरोसा कर प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई। मोदी पर एतबार कर लंगड़े, लूले, कपटी यहां तक कि मक्कार और झूठे फूलछाप उम्मीदवारों को भी जनता ने केवल यह सोचकर वोट दिया कि मोदी में खोट नहीं तो फिर वोट में दोष नहीं। मगर अब तो गुजरात के व्यापारी ही मोदी से नाराज हैं। वे अपनी रसीद बुक में लिखवा रहे हैं- कमल का फूल हमारी भूल। सड़कों पर टेक्सटाइल व्यापारी पैदल मार्च कर आक्रोश बयां कर चुके हैं। छोटा, मध्यम और बड़ा वर्ग नोटबंदी और जीएसटी के नाम पर रो रहा है। 40 सप्ताह सरकार चलाने के बाद अभी तक आप जुमलेबाजी से काम चला रहे हैं। रोजगार के नए अवसरों का श्रजन नहीं कर पाए। उद्योग मंदी की मार से दम तोड़ रहे हैं। मुझे तो ये लगता है कि केन्द्र सरकार नोटबंदी से उपजे हालातों को काबू में लाने के लिए जीएसटी इसी सोच के साथ लाई कि इसमें आर्थिक सुदृढ़ीकरण होगा, लेकिन यह प्रयोग भी अब केन्द्र के लिए जानलेवा ही साबित हो रहा है। और कितना समय लगेगा मजदूरों को दो वक्त की रोटी देने में, बेटियों की सुरक्षा करने में, किसानों को उनका हक दिलाने में ... मैं पूछता हूं छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए केन्द्र सरकार को और कितना समय चाहिए?

दुष्यंत कुमार के शब्दों में-
मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
दोस्तो अब मंच पर सुविधा नहीं है
आजकल नेपथ्य में संभावना है।

प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के सामने किसी माई के लाल में ऐसा साहस नहीं जो सही को सही और गलत को गलत बोलने की सोचे। मगर जिनके खून में आत्मसम्मान, स्वाभिमान है, वे नेता अपनी ही सरकार के निकम्मेपन पर उंगलियां उठाने लगे हैं। क्या इसी अच्छे दिन का वादा मोदी ने देश की जनता से किया था? देश की विकास दर 7.2 फीसदी से गिरकर 6.7 पर गिर गई और तब भी चुप रहें? शायद यही सोच भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने मीडिया में आकर मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर सरकार को घेरा है। इससे पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण शौरी भी केन्द्र सरकार की नीतियों के ढिंढोरे को ढोल में पोल बता चुके हैं। सत्ता पर आर्थिक नीतियों का दाग लग रहा है। नरेन्द्र मोदी देश और दुनिया में खिले हुए हैं मगर कमल मुरझा रहा है। वरना सुब्रमण्यम स्वामी, गुरुमूर्ति, शौरी और देश के पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिंन्हा की जुबां से नुकीले शब्द बांण क्यों निकलते? मोदी की एकाकी चाल का खामियाजा पूरी पार्टी को 2019 के चुनाव में कहीं भुगतना न पडेÞ, कदाचित इस बात से भाजपा की मातृ संस्था संघ भी चिंतित है। यही वजह है कि स्वदेशी जागरण मंच के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की भौहें तन गई हैं। ये वही ठेंगड़ी जी हैं, जिन्होंने 2002 में वाजपेयी सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता पर खिंचाई की थी। जिसका असर ये हुआ कि तब वित्तमंत्री रहे इन्हीं यशवंत सिन्हा को कुर्सी छोड़नी पड़ गई थी।

अटल-आडवाणी की एकला चलो नीति से नाराज होकर संघ ने 2004 के आमचुनाव में खुद को अलग कर लिया था। नतीजा यह रहा कि भाजपा हार गई। यदि मोदी सरकार देश की खुशहाली, समृद्धि और अच्छे दिन लाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत कर रही है तो फिर उसकी नीतियों से निकली राहत जनता तक क्यों नहीं पहुंच पर रही है? 2004 में भाजपा को फीलगुड और शाइनिंग इंडिया ले डूबा था। लिहाजा, संघ को इस बात का डर होना स्वाभाविक है कि कहीं 2019 में नोटबंदी और जीएसटी कमल को सत्ता से उखाड़ न फेंके। आखिर संघ की जवाबदेही भी तो जनता की निगाह में बनती है। क्योंकि करोड़ों स्वयंसेवकों का पसीना ही है, जिसकी बदौलत कमल खिलता है। आने वाले डेढ़ साल केन्द्र सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियों से भरे होंगे। इसलिए वादों को पूरा करना ही पड़ेगा। इवेंट और जुमलों से देश में अच्छे दिन नहीं आते, इस बात को समझना होगा।

Source : विजय शुक्ला