मोदी सरकार के साढ़े तीन साल पूरे हो गए हैं। आम चुनाव से पूर्व देश की जनता से किए गए वादों की कसौटी पर सरकार नाकाम साबित हुई है। आरबीआई की ताजा रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रियों के नींद उड़ा दी है। जनता को सिर्फ मोदी से जवाब चाहिए और इसीलिए बुधवार को आरबीआई की ताजा रिपोर्ट जैसे ही आई मोदी और पीएमओ ट्विटर पर काफी सक्रिय हो गए। देश की चौपट अर्थव्यवस्था को लेकर पीएम अब तक 50 के करीब सफाई देने वाले ट्वीट कर जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल आरबीआई ने अनुमान जताया है कि इस साल की विकास दर 6.7 फीसदी रहने का अनुमान है। जबकि यह विकास दर पिछले साल 7.2 प्रतिशत थी। आरबीआई पर हर तरह से उत्साह बढ़ाने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत करने का दबाव बनाने के प्रयास विफल हो गए हैं। इसलिए मोदी जी को जमाने के सामने सफाई देने को मजबूर होना पड़ रहा है। वे निवेश के मामले में भी सरकार का पर्फामेंस खराब है। महंगाई को रोक पाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के मामले में भी केन्द्र सरकार विफल रही है। मेक इन इंडिया का नारा देकर टीवी चैनलों में वाहवाही बंटोरने वाली केन्द्र सरकार विपक्ष को यह नहीं बता पा रही है कि इससे जनता को कितना और क्या फायदा हुआ? 2019 के आम चुनाव को किस तरह से फिर जीता जाए इसके गुणा-भाग तेज हो गए हैं। जनता को अच्छे दिन इन साढ़े तीन वर्षों में नसीब नहीं हुए और न ही होने वाले हैं। उसे अब चुनावी झुनझुने की आवाज सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। विकास की बात बेमानी साबित हुई। इस दौरान साढ़े तीन साल में मीडिया का गला रेतने के भरसक प्रयास अभी भी जारी हैं। खासकर प्रिंट मीडिया केन्द्र के निशाने पर है। एक वर्ग को चौथे स्तंभ का मालिक बनाने का संकल्प सा नजर आ रहा है। हजारों पत्रकार बेरोजगार होकर नई नौकरी ढूंढ रहे हैं। हजारों छोटे और मध्यम अखबार अंतिम सांस ले रहे हैं। लघु एवं कुटीर उद्योगों की हालत पस्त हो चुकी है। पता नहीं मोदी सरकार कौन सा न्यू इंडिया बनाना चाहती है? नोटबंदी और जीएसटी के फैसले आने वाले समय में मोदी सरकार के लिए फांसी के फंदे साबित होंगे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी केन्द्र सरकार को अप्रत्यक्ष तौर पर नसीहत दे चुके हैं। संघ यह बात जानता है कि मोदी इस संसार में यदि किसी की सुनते हैं तो वो अमित शाह हैं। लेकिन अमित शाह को इकोनॉमिक्स समझ में नहीं आती। कांग्रेस पार्टी बौद्धिक और वैचारिक रूप से लकवा ग्रस्त है। इसलिए उससे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। इन दिनों कांग्रेसी देश की चिंता छोड़कर राहुल गांधी के ताजपोशी को लेकर उत्सुक हैं। उनके अध्यक्ष बनने से कांग्रेस पार्टी का खोटा भाग्य नहीं बदलेगा। राहुल गांधी बौद्धिक कंगाली से जब तक नहीं उबरते जनता उन्हें पप्पू ही समझती रहेगी। उधार के भाषणों को पढ़कर बोलने से न वे राजीव गांधी बन पाएंगे और न राहुल गांधी। उन्हें कांग्रेसियों की कद्र होती तो विपक्ष की दुर्गति ऐसी नहीं होती। इसलिए देश की जनता को मजबूरी में मोदी के साथ ही चलना पड़ेगा। चाहे जितनी दुर्घटनाएं झेलनी पड़ें। बचे हुए डेढ़ साल में आपको ताजा तरीन नए जुमले और बहुरंगीन विज्ञापनों का सामना करना पड़ेगा। आपसे हिन्दू होने के बदले हिन्दूवादी चेहरे को चुनकर भारत माता का कर्ज उतारने की कसमें भी खिलवाई जाएंगीं। और आप बेवकूफ लोग नेताओं की बतोलेबाजी और जुमलेबाजी का शिकार होंगे। क्योंकि अच्छे दिन चल रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियां  आज की सरकार से बेहतर थीं। मोदी ने विश्व में भारत की शान बढ़ाई लेकिन देश के सामने कई तरह के खतरों से अब उन्हें निपटना होगा। व्यक्तिगत रूप से मोदी एक जोरदार नेता हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उनकी परीक्षा बांकी है।