मध्यप्रदेश सरकार ने नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म करने वाले को फांसी देने की सजा वाला बिल मंजूर करके एक नई बहस छेड़ दी है। सामूहिक दुष्कर्म पर फांसी की सजा के बिल को मंजूरी देकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक और सराहनीय मिसाल भरा कदम बढ़ाया है। पर यह कितना प्रासंगिक है इस पर चर्चा होनी आवश्यक है। मुझे लगता है सरकार को यह बिल लाने को इसलिए विवश होना पड़ा, क्योंकि पिछले साल भर से महिला छेड़छाड़, बलात्कार और सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं से मप्र की कानून व्यवस्था की देश भर में थू-थू हो रही है। सरकार को इन घटनाओं पर लगाम लगाने का कोई उपाय न तो दिखाई पड़ रहा था और न ही कुछ सूझ पा रहा था। राजधानी भोपाल में पुलिस मुख्यालय और मुख्यमंत्री निवास की नाक के नीचे मासूम बेटियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं मगर पुलिस कुछ नहीं कर पाई। पहले लगता था कि यहां अपराधियों पर पुलिस का भय खत्म हो गया है मगर अब यह पूरी तरह से यकीन के साथ कह सकता हूं कि मप्र में कानून का राज पूरी तरह से सफाचट है। अपराधियों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि पुलिस अधिकारी की बेटी के साथ थाने के पास कुछ नरपिशाच सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसे मरा हुआ समझकर भाग जाते हैं और उसके माता-पिता रिपोर्ट लिखाने पुलिस थानों का चक्कर काटते रहे,मगर मामला दर्ज नहीं करवा पाए। जब अखबार और टीवी चैनलों ने इस खबर को दिखाना चालू कर पुलिसिया तंत्र की बखिया उधाड़ डाली तब कहीं जाकर मामला दर्ज हो पाया। जब पुलिस अधिकारी को अपने ही विभाग से मदद मिलने में इतनी फजीहत उठानी पड़ी तो आप सोच नहीं सकते हैं,पूरे राज्य की हकीकत कैसी होगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश भर में खुद को बेटियों का मामा कहते नहीं थकते,लेकिन बेटियों को सुरक्षा दे पाने में वह भी पूरी तरह से फेल ही कहे जाएंगे? इस समय मप्र में कानून व्यवस्था तो केवल भगवान भरोसे ही चल रही है। खाकी वर्दी का डर तो ऐसा खत्म हो चुका है कि जुआ पकडऩे पहुंचे पुलिस जवान को जुआरी दिन दहाड़े गोली मार देते हैं। नदियों पर अवैध रेत खनन करने वाले माफिया उनके विरूद्ध कार्रवाई करने वालों को ट्रेक्टर ट्राली और जेसीबी से कुचल रहे हैं। हकीकत तो यह है कि मप्र का पुलिस अमला ही अब अपराधियों से भय खाने लगा है। आखिर कानून व्यवस्था की इतनी दुर्गति क्यों हुई? इस बारे में क्या हमारे लोकप्रिय और उदार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कभी सोचा ? यदि सोचा होता तो परिस्थितियां इस कदर निरंकुश और अराजक नहीं हो पाती। खाकी जब नेताओं की पिठ्ठू और गुलाम बनकर काम करेगी तो कानून व्यवस्था का नाश होना सुनिश्चित है ! काश, मुख्यमंत्री ने अफसरों के हवाले ही सब कुछ न छोड़ा होता तो भी इतनी खराब हालत आज नहीं होती। 12 साल से मप्र का मुख्यमंत्रियाना कर रहे शिवराज अपराधियों के प्रति चट्टान से ज्यादा कठोर हैं। उन्हीं के राज में गुंडों की बारातें मप्र की जनता ने देखी। मध्यप्रदेश की कानून व्यवस्था के नपुंसक होने के लिए हमारी व्यवस्था सबसे ज्यादा दोषी है। मैं मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर इसका दोषी नहीं मानता मगर आज जो भी राज्य में घट रहा है मुख्यमंत्री होने के नाते वह उत्तरदायी तो माने जाएंगे। बीमारू और पिछड़े राज्य का कलंक मिटाकर मप्र को देश का विकसित राज्य बनाने वाले शिवराज के स्वर्णिम मध्यप्रदेश के माथे पर दुराचारियों ने कालिख पोत दी है। यदि वाकई वे अफसरों को उल्टा लटकाने का साहस दिखाते तो आज नाबालिगों से दुष्कर्म करने वालों के खिलाफ एक और नया कानून बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कानून बनाने से अपराध न तो पहले रूके और न ही नया कानून बनाने से ही दुष्कर्म या कुकर्म की घटनाओं को रोका जा सकता है। हमारे कानून में पहले ही धाराओं की बाढ़ है,फिर एक और नया कानून अपराधियों का क्या बिगाड़ पाएगा? भारत का यौन उत्पीडऩ कानून इस तरह तैयार किया गया है ताकि अभियोजन पक्ष अधिक प्रभावी ढंग से पैरवी कर सके और पीडि़त को न्याय मिले। लेकिन इस कानून का एक नकारात्मक पहलू यह भी सामने आया कि कथित तौर पर इस कानून की वजह से अन्याय भी हो रहा  है। साक्ष्य के अभाव में कई बार निर्दोष प्रताडऩा का शिकार हो जाते हैं। दोनो पक्षों की आपसी सहमति से संबंध बनाने की दशा में कथित तौर पर कई बार पुरूषों को प्रताडि़त होना पड़ता है। कानून तो अभियोजन को संरक्षण देने के लिए बनाए गए हैं मगर इनका देखा गया है कि इसका उपयोग ब्लैकमेलिंग या फिर चरित्रहनन के लिए हथियार के रूप में होता है। दुष्कर्म के झूठे मामलों से अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। अदालतें इस पर चिंता प्रकट कर चुकी हैं। दुष्कर्म एक गहरी पीड़ा है,लेकिन इस समस्या के दूसरे पहलू को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। हमारे कानून में धारा 376 में फांसी तक की सजा का प्रावधान पूर्व में वर्णित है। तो बाल अवस्था में यौन अपराधों की रोकथाम के लिए वर्ष 2012 में पाक्सो यानी प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट नामक एक विशेष कानून बनाया गया है। जिसकी धारा 3 से लेकर 10 तक में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को किसी भी प्रकार का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आता है। इसके दोषी को उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है। दिल्ली के बहुचर्चित निर्भया कांड के बाद कानून में कड़े संशोधन किए गए पर क्या इनसे दुष्कर्म या कुकर्म की घटनाएं रूकीं ? कड़े कानून बना देने से अपराधों पर लगाम नहीं लगाई जा सकती बल्कि इसके लिए व्यवस्था में मूलभूत सुधार करने होंगे। जन-जाग्रति से कानून का डर अपराधों की रोकथाम में ज्यादा प्रभावी भूमिका अदा कर सकता है। नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म में मप्र सरकार के नया कानून बनाने से क्या होगा जब सिस्टम कमजोर असहाय होगा। दुराचारियों को फांसी से भी और अधिक कोई सजा हो तो मिलनी चाहिए इसका मैं समर्थन करता हूं,मगर इस बात की क्या गांरटी है कि फांसी देने के कानून से दुराचार की घटनाएं रूकेगी। इसलिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को व्यवस्था सुधार में ज्यादा गंभीर होने की जरूरत है। कड़े कानून बनाने से दुष्कर्म के बाद हत्या की घटनाओं में इजाफा होने की बात से भी इंकार नहीं कर सकते। चुनावी वर्ष को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि सिस्टम में कसावट लाकर सरकारें बहन-बेटियों की वाहवाही बंटोरें। सरकारों को सियासी शिगूफेबाजी से परहेज बरतना चाहिए।