भोपाल। पिछले 19 साल से कांगे्रस पार्टी का नेतृत्व कर रहीं श्रीमती सोनिया गांधी निश्चित रूप से एक असाधारण महिला हैं। वरना देश के सबसे पुराने और बड़े जिस राजनैतिक दल कांगे्रस का उन्होने अपने राजनैतिक कौशल,विवेक और चातुर्य के साथ नेतृत्व का प्रमाण दुनिया के सामने प्रस्तुत किया,वह कोई साधारण महिला के लिए संभव नहीं था। उनकी असाधारणता का गवाह इस देश का प्रत्येक नागरिक उस वक्त से है जब प्रधानमंत्री पद को उन्होने सिरे से ठुकराने का फैसला कर विश्व को चौंका दिया था। घनघोर संकट से पार्टी को उबारने का करिश्मा दिखाने वाली श्रीमती सोनिया गांधी के इकलौते पुत्र राहुल घोषित तौर पर कांगे्रस के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं। राहुल अप्रैल 2007 से पार्टी उपाध्यक्ष के तौर पर संगठन का कार्य कर रहे हैं,लेकिन उनकी मां पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा मानी जातीं हैं। मगर अध्यक्ष बनने के बाद वे कांगे्रस का सबसे बड़ा प्रमुख चेहरा बन गए हैं। यानी एक सौ बत्तीस बरस पुरानी कांगे्रस के नंबर वन नेता। राहुल जो चाहेंगे वैसा कर सकेंगे। जिन हालातों में राहुल गांधी के जीवन की अति महत्वपूर्ण नई पारी शुरू होने जा रही है,वह कांगे्रस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण दौर है। क्योकि देश के 95 प्रतिशत राज्यों में भाजपा का कमल खिला हुआ है। राहुल को ऐसे वक्त में कांगे्रस का नेतृत्व मिला है जब कांगे्रस के सामने अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। दशकों तक केंद्र की सत्ता पर राज करने वाली कांगे्रस आज लोकसभा में 44 सीटों के साथ विपक्ष की भूमिका में है। राहुल ऐसे नाजुक वक्त में कांगे्रस की बागडोर संभालने जा रहे हैं जब पार्टी में ही अंदरूनी घमासान छिडऩे के प्रबल आसार हैं। तो बाहर उनका सामना नरेंद्र मोदी जैसे उसे अजेय नेता से है जिनके सामने वे अभी तक अप्रभावी और विफल साबित हुए हैं। राहुल गांधी सीधे कांगे्रस के अध्यक्ष बन जाते तो शायद उतने सफल नहीं हो पाते,जितने अब हो सकते हैं। वर्ष 2014 आम चुनाव और बीस राज्यों में पार्टी की पराजय का स्वाद चखने का कड़वा अनुभव भी उन्हें मिल चुका है। 13 साल से सांसद के रूप में राहुल ने संसदीय परंपराओं को समझ लिया है। इसके साथ-साथ पार्टी की मैदानी वास्तविकता को बहुत बारीकी से समझने का उन्हे पर्याप्त समय मिला है। यह अवसर न तो उनके पिता स्व.राजीव गांधी को मिला और न ही मां श्रीमती सोनिया को । राजीव गांधी को कांगे्रस पार्टी का नेतृत्व उनकी मां और देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गांधी की हत्या के कारण वर्ष 1985 में मजबूरन संभालने आगे आना पड़ा। और इंदिरा ने सन1959 में कांगे्रस की बागडोर संभाली थी। तब उनके सामने उनके अपनी ही पार्टी के कई बड़े नेता विरोधी बनकर खड़े हो गए थे। राहुल गांधी की दादी इंदिरा को अपने पिता और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से काफी कुछ सीखने को मिला। जब उन्होने पार्टी की कमान संभाली तब देश में विरोधी दलों का बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं था। उनके प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में लगाई गई इमरजेंसी ने विरोधियों को इतना मजबूत होने का अवसर दिया,नतीजन इंदिरा को न केवल चुनाव हारना पड़ा बल्कि सत्ता गंवानी पड़ी। विपक्षी दलों के बढ़ते प्रभाव का दौर वास्तव में 1975 में थोपे गये आपातकाल के बाद ही शुरू हुआ। वरना कांगे्रस तो 90 प्रतिशत राज्यों पर राज करती थी। राजीव गांधी के कांगे्रस अध्यक्ष बनते तक कांगे्रस का ग्राफ तेजी से गिरना शुरू हुआ,मगर राजीव ने किसी तरह से उसे संभाला और केंद्र की सत्ता संभाली। 1991 में अचानक उनकी हत्या ने कांगे्रस पर घनघोर संकट खड़ा कर दिया था,तब कांगे्रस की अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आई। सीताराम केशरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया पर वे पार्टी के बिघटन को नहीं रोक पाए। नाजुक वक्त में श्रीमती सोनिया गांधी न चाहते हुए भी अपने पूर्वजों की विरासत को बचाने के लिए 1998 में कांगे्रस की नई अध्यक्ष बनीं। और तब से लेकर आज तक उन्होने पार्टी को काफी मजबूती दी है। उनके नेतृत्व में दो बार कांगे्रस की सरकार भी बनीं। इंदिरा की बहू सोनिया गांधी ने विदेशी होते हुए भारतीय संस्कार,परंपराओं एवं रीति-रिवाजों का जिस ढंग से पालन किया,वह सराहनीय है। सत्तर वर्ष की आयु छू रहीं सोनिया गांधी का स्वास्थ्य अब जवाब दे रहा है। मोदी के सामने गांधी परिवार का करिश्मा अब फीका पड़ चुका है। तेजी से बदलते दौर में राहुल गाधी को अध्यक्ष बनाकर कांगे्रस ने युवा नेतृत्व देने का सबसे बड़ा दांव चला है। इस दांव से गुजरात में हो रहे विधानसभा चुनाव में लाभ मिलने की उम्मीदें कांगे्रस को हैं । जहां चंद दिनों बाद परिणाम आने वाले हैं। पार्टी उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया था। तब कांगे्रस ने 206 सीटें जीतीं थीं। अपनी मां की तरह राहुल गाधी को भी एक असाधारण व्यक्ति कहा जाना चाहिए क्योंकि परिस्थितियां पक्ष में होने के बाद भी प्रधानमंत्री पद नहीं स्वीकारा। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह कई बार उनके लिए रास्ते से हटने को सहर्ष तत्पर दिखे मगर राहुल गांधी ने संगठन को प्राथमिकता दी। दरअसल,वे लंबे समय के लिए कांगे्रस के भविष्य को सुरक्षित और मजबूत बनाना चाहते हैं कदाचित इसीलिए उन्होने अभी तक विवाह नहीं किया है। संघर्ष के मार्ग पर चल रहे राहुल के लिए कई तरह की चुनातियां हैं।  उन्हें वीरभद्र सिंह, मोतीलाल वोरा, गुलामनबी आजाद, कमलनाथ,दिग्विजय सिंह, मल्लिकार्जुन खडग़े,अशोक गहलोत,शीला दीक्षित सरीखे वरिष्ठ नेताओं के अहं को बर्दाश्त करते हुए दूसरी पंक्ति के नेताओं के बीच तालमेल बिठाना पड़ेगा। तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेन्द्र हुड्डा, सचिन पायलट,जितेंद्र सिंह, राजीव सातव, सुरजेवाला, अजय माकन,राजीव शुक्ला, प्रदीप जैन आदित्य,सूरज एमएन हेगड़े,मीनाक्षी नटराजन जैसे युवा नेताओं को संगठन में महत्व देना होगा।
 बहुत आवश्यक न हो तो क्षेत्रीय दलों से गठबंधन से परहेज बरतना फायदेमंद रहेगा। कांगे्रस के कमजोर होने का एक बड़ा कारण क्षेत्रीय दलों से गठबंधन है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि यूपी में सपा के साथ कांगे्रस मिलकर चुनाव न लड़ती तो आज बेहतर स्थिति में होती। राहुल एक जुझारू,क्षमतावान और सामथ्र्यवान नेता हैं,इसलिए वे कांगे्रस को बहुत आगे ले जाने की योग्यता अब रखने लगे हैं। और जहां तक देश का प्रधानमंत्री बनने की योग्यता का प्रश्न है,तो उसके लिए उन्हें जनता का भरोसा हासिल करना पड़ेगा। बहन प्रियंका को पार्टी संगठन में कोई बड़ी भूमिका देने से फायदा होगा। यह वक्त कांगे्रस को नए सिरे से गढऩे का है। निष्ठावान,समर्पित,ईमानदार कार्यकर्ताओं को अवसर देकर वे भाजपा के खिलाफ एक बड़ा मजबूत मोर्चा खड़ा कर सकते हैं। 2014 उनके हाथ से निकल गया,मगर 2019 में वे मोदी को कड़ी टक्कर देकर सत्ता से पलट सकते हैं। मगर उसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। अब तो  मोदी हों या भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सबको राहुल गांधी से डर लगने लगा है। गुजरात में मोदी-शाह की जोड़ी को हिंदुत्व के जिस अस्त्र का इस्तेमाल कर राहुल जवाबी हमले कर रहे हैं,उससे भाजपा बेचैन और चिंतित है। मोदी-शाह या फिर भाजपा चाहे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न करे मगर उसे भी लगने लगा है कि राहुल उनके लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरेंगे। राहुल इंदिरावादी बनकर कार्य करेंगे तो काफी फायदा होगा। जिस जनता ने इंदिरा को आपातकाल का दोषी मानकर सत्ता से बेदखल किया उसी ने चंद वर्षों बाद भारी बहुमत देकर सत्ता सौंपी। राहुल को भी कुछ बड़े चमत्कार दिखाने होंगे। गाधी खानदान को चमत्कारी माना जाता है,लेकिन कुनीतियों के कारण उसे ग्रहण लगा है। सोनिया का करिश्मा खत्म हो चुका है लेकिन राहुल के पास सब कुछ वापस पाने का अवसर है। गुजरात में भाजपा की सरकार बनने में कोई खतरा नहीं है,लेकिन 2019 मोदी के लिए कहीं से आसान नही होगा।