विदेशी बैंकों में जमा खरबों रूपये कालाधन और भारत में निवासरत प्रत्येक परिवार के खाते में 15 लाख रूपये तो अब तक नहीं आए मगर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव और नजदीक जरूर आ गए हैं। देश की जनता के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के वादे और इरादों की सच्चाई बहुत हद तक स्पष्ट हो चुकी है। मोदी ने जनता से चुनाव में वोट मांगते समय वादों का बवंडर मचाकर कांगे्रस की खटिया खड़ी कर दी थी मगर आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को दोवारा अपनी बंपर जीत शंका में डाल रही है। सत्ता के तलवे चाटने वाले कुछ टीवी चैनल अपनी मनगढ़ंत सर्वे रिपोर्ट के माध्यम से केंद्र में दोबारा मोदी सरकार आने के ढोल पीटते नहीं थक रहे लेकिन खुद मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बात को लेकर चिंतित दिख रहे हैं कि आम चुनाव को जीतने का फार्मूला कहां से तैयार किया जाए। सालाना दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने की बात हो या फिर महंगाई घटाकर आम आदमी को राहत से दो वक्त की रोटी देने की गारंटी, सब बातें हवा हवाई हो गईं। न तो महंगाई तिल भर घटी और न ही देश की विकास दर इंच भर आगे बढ़ पाई। आंकड़ों की जादूगरी का खेल भी अब जनता को नहीं सुहा रहा है। पिछले चार साल के कामकाज की जो तस्वीर टीवी चैनलों पर दिखाई और बताई जा रही है,वास्तव में वैसी है नहीं। तभी तो विदेशी पुल -पुलियों और सड़कों के फोटो दिखाकर विकास गिनाया जा रहा है। उज्जवला योजना के जरिये सरकार ने घर-घर रसोई चूल्हे और गैस सिलेंडर मुफ्त तो बंटवा दिए मगर चुपचाप रसोई गैस के दाम साढ़े पांच सौ से बढ़कर आज पौने आठ सौ रूपये कर दिए गए। पेट्रोल-डीजल के दाम आए दिन बढ़ा दिए जाते हैं। एशिआन देशों के नेताओं को गणतंत्र दिवस पर खास मेहमान बनाकर भारत बुलाने से गरीब के घर में रोटी नहीं आ गई। और न ही पाकिस्तानी सेना के सीमापार से हो रहे हमलों में ही कोई कमी आई है। प्रधानमंत्री जी पोज बदल बदलकर फोटो खिंचवाते रहते हैं और यह देश अपनी किस्मत पर आगे बढ़ रहा है। कहने के लिए केंद्र सरकार में जंबो मंत्रिमंडल है परंतु उनकी हैसियत फाइल खिसकाने वाले बाबूओं जैसी......है। सरकारें निकम्मापन दिखातीं रहीं तो भी आगे बढ़ता रहेगा। मेक इन इंडिया का नारा देकर विदेशी कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछाकर यदि हमारे नौजवानों को रोजगार के अवसर मिल सकें तो भी हमें मंजूर लेकिन बात बनने के बजाय बिगड़ती जा रही है। सीमा पार से घ़सपैठ नहीं रोकी जा सकी। हां,पिछले चार साल में इस सरकार ने अपनी ब्रांडिग के मामले में मिसाल जरूर पेश की है। दरवाजा बंद करो वाले विज्ञापन में अमिताभ बच्चन साहब कितनी मेहनत कर रहे हैं लेकिन शौंचालयों के लिए पानी का इंतजाम किए बिना स्वच्छ भारत कैसे बनेगा? भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की एक दो घटनाएं हमें मोदी राज की ओर से तसल्ली जरूर देंती हैं लेकिन भारतीय सैनिक के एक सिर के बदले दुस्मनों के दस सिर नहीं आए । इन चार सालों में पिछली सरकार की योजनाओं के नामों को बदलकर उसे अपने नाम से करने की होड़ और हड़बड़ी में मौजूदा सरकार अधिक दिखी। इस दौरान पहली बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सुुप्रीम कोर्ट के ही तीन जजों द्वारा खुलेआम प्रेस कान्फें्रस करते भी हमने देखा। जनहित से जुड़े जो काम होने चाहिए उन पर सरकार का ध्यान कमजोर लग रहा है। वो तो गनीमत रहीं कि सरकार टीवी चैनलों पर यह दवाब नहीं बना पाई कि कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गणतंत्र दिवस पर छठी लाइन में बिठाने की वीडियो न दिखाई जाए।
 उसका बस चले तो राहुल को अखबार टीवी पर दिखने ही न दे। राहुल गांधी से मोदी जी इतना घबराने क्यों लगे हैं? यह स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वाह तो नहीं कहा जा सकता कि अपने सिवा किसी और को सांस न लेने दें। मुझे अपनी सरकारों पर उस वक्त बहुत गुस्सा आता है जब चपरासी के पद के लिए साक्षात्कार की लाइन में खड़े पीएचडी,एमएसी या एमबीए डिग्रीधारी युवाओं को देखता हूं।  
हिंदू-मुस्लिम,दलित को कार्ड बनाकर सरकारें जब चाहे खेल देती हैं,यह घिनौनापन बंद होना चाहिए । पढ़े लिखे नौजवानों को इसे बदलने के लिए आगे आने की जरूरत है। जो सरकार विकास के काम करे उसे जमकर वोट दीजिए और जो सरकार सिर्फ जुमलेबाजी करे उसकी खाल खींच लीजिए। यही लोकतंत्र की ताकत है। गुजरात और उत्तराखंड राज्य को जीतने के लिए प्रधानमंत्री को गली-गली घूमने पर विवश होना पड़ गया। जो इस बात को दर्शाता है कि देश की जनता में भाजपा और मोदी दोनो की लोकप्रियता का ग्राफ घट रहा है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि कांगे्रस मजबूत हो रही है वह तो गर्त में है। अब कोई चमत्कार ही उसे बाहर निकाल सकता है। बड़ी चालाकी से मोदी जी ने पहले लालू -नीतीश को अलग कर दिया। पहले लालू ने चारा खाया अब जेल की हवा खा रहा है। पश्चिम बंगाल में ममता दीदी अकेले साम्राज्य बचाने विरोधियों से जूझ रही हैं। दक्षिण भारत में अम्मा के नाम से विख्यात जयललिता के निधन से एआइडीएमके अपाहिज हो चुका है। वह फिर दो हिस्सों में कभी टूट सकता है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार बुढापे में अब मोदी से मुकाबला करने से रहे। बसपा प्रमुख मायावती अपनो की चुनौतियों से लड़ रही हैं। यानी मोदी के सामने कोई नेता ऐसा नहीं दिख रहा जो उन्हें चुनौती दे सके। तीसरा मोर्चा खत्म ही समझिए। ले देकर एक राहुल गाधी ही विपक्ष के उम्मीद की आखिरी किरण हैं। मगर उनका संगठन खटारा हो चुका है। बुढ्ढे ठुढ्ढे नेताओं ने अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए नई पीढ़ी को निगल लिया। उन्हीं के बीच से राहुल को नई कांगे्रस तैयार करने की बड़ी गंभीर चुनौती है। मोदी के लिए सबसे अच्छी किस्मत की बात यही है कि वे जिस दौर में देश के प्रधानमंत्री हैं , विपक्ष गंभीर नेतृत्वविहीनता से ग्रस्त है। मेरा मानना है कि यही हाल रहे तो मोदी जी का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जाएगा। परंतु इससे देश का कितना भला होगा यह बड़ा सवाल है। फिलहाल,मोदी सरकार का पूरा जोर दूसरी बार सत्ता में आने के प्रयासों पर केद्रित होता दिख रहा है। जाहिर है विकास कार्यों पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। निरंतर सफलता का अर्थ यह नहीं कि आप अधिक योग्य हैं । यह महज अच्छे अवसर हैं। जो सदैव आपके पक्ष में नहीं होते। इसलिए अवसरों का लाभ उठाकर विकास के नित नए आयाम स्थापित कीजिए ।
जनता को अनचाहे करों और किसानों को कर्ज के बोझ से सदा के लिए निजात मिल सके। हर घर को छत देने की सोच सराहनीय है मगर योग्यता आरक्षण की आग में न जले,ऐसे उपाय हों। करीब तीस बरस बाद मोदी जी और उनके मंत्रियों के पास जनसेवा से सुनहरे अध्याय लिखने का मौका है। मोदी जी प्रधानमंत्री पद का सुयोग्य चेहरा हैं। वे पीएम दिखते भी हैं और लगते भी हैं। उनके नेतृत्व में देश का मान-सम्मान भी बढ़ा है। यदि वे चाहें तो जनहितकारी,समदर्शी और क्रांतिकारी उदार दृष्टिकोण अपनाकर पंडित नेहरू, लालबहादुर शास्त्री,अटलजी-लोहियाजी और कलाम साहब की तरह स्वयं को जीते जी महान बना सकते हैं। और अंत में विरोधियों को मोदी का अंदाज हिटलर जैसा चाहे लगे मगर नहीं है।