मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मप्र में किसानों को खुशहाल बनाने के लिए जितनी ईमानदारी से प्रयास किए इससे पहले किसी सरकार या उसके मुख्यमंत्री ने नहीं किए होंगे। मगर इन सब प्रयासों के बावजूद किसान अपनी लोकप्रिय सरकार से इनदिनों आक्रोषित है। देश में किसानों की कुल अनुमानित संख्या करीब सोलह करोड़ है और अकेले मप्र में लगभग 52 लाख किसान हैं। शिवराज सरकार ने किसानों के लिए वैसे तो कई राहत भरी योजनाएं चलाईं लेकिन एक योजना ऐसी शुरू की गई जिसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की दृष्टि से गेमचेंजर माना गया। सरकार ने इस योजना के प्रचार-प्रसार में कोई कमी बरती हो ऐसा नजर नहीं आता लेकिन भावांतर योजना के भंवर में मप्र सरकार फंसती दिखाई दे रही है। योजना की सबसे बड़ी खामी यह है कि सरकारी महकमा किसानों को यह समझाने में पूरी तरह विफल रहा कि ये एमसीपी का गुणा-भाग क्या चक्कर है। अच्छी मंशा रखने के बावजूद किसान अपनी उपज का पर्याप्त उचित मूल्य न मिल पाने से नाराज हो गया है। भाजपा विधायकों की ओर से भी जनता को यह समझाने के प्रयास कम देखे-सुने गए हैं। हल चलाकर जीवन गुजारने वाला किसान मंडी में अपनी फसल को बेचने जाता है मगर व्यापारियों की ठगी का शिकार होकर लौट आता है। कृषि क्षेत्र में सिंचाई का कागजी रकबा बढ़ गया। लेकिन खाद और बीज के लिए किसान भटकता है। मंदसौर गोलीकांड की घटना ने मालवा-निमाड़ के किसानों को सरकार के खिलाफ उनदिनों आग बबूला कर दिया था,जिसका असर पूरे प्रदेश में आज भी बना हुआ है। भावांतर योजना इस बार के चुनाव में सरकार के सामने किसानों का वोटबैंक हासिल करने में एक बड़ी चुनौती बनकर रहेगी। किसानों पर कर्ज की मार उसे परेशान किए हुए है। आज राज्य के प्रत्येक किसान पर औसतन 57-58 हजार रूपये का कर्ज है। करीब 52 लाख किसानों पर तीस हजार करोड़ का कर्ज है। बैंकों की अमानवीय वसूली प्रक्रिया से वह बुरी तरह त्रस्त है। सरकार के सामने भावांतर के बाद दूसरी बड़ी चुनौती प्रमोशन में आरक्षण की पूरे प्रदेश में घधक रही आग है,जिसमें मुख्यमंत्री ने कोई माई का लाल इसे खत्म नहीं कर सकता, कहकर घी डालने का काम किया। इसकी लपटों से प्रदेश के करीब पांच लाख सरकारी कर्मचारी झुलस रहे हैं। समावेशी विकास का राग अलापने वाली सरकार से प्रमोशन में आरक्षण को समर्थन देने की चूक कैसे और किसके कहने से हुई,यह तो वही जाने मगर सवर्ण वर्ग इस मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई मैदान से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर अनुसूचित जाति और जनजाति संगठन प्रमोशन में आरंक्षण की मांग कर सियासी तलवारें लहरा ही रहे हैं। मुख्यमंत्री के सामने इस धर्मसंकट से बाहर निकलने का कोई रास्ता फिलहाल दिखाई नहीं देता। ऐसे में सरकार के समावेशी विकास पर प्रश्रचिन्ह खड़े होने स्वाभाविक हैं। दलित एजेंडे को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सरकार के सत्ता पतन का एक सबसे बड़ा कारण आज तक माना जाता है,कमोवेश प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा सामाजिक समरसता में विष घोल सकता है। बिजली,पानी और सड़कों के कारण दिग्विजय सरकार गई थी हालांकि इस सरकार में स्थिति कई गुना बेहतर है। फसल बीमा योजना के लाभ से अब तक हजारों किसान वंचित हैं। किसनों को लग रहा था कि आतताई और घमंडी दिग्विजय शासन को ध्वंस कर वे जिस भाजपा को वोट देकर सिर माथे बिठा रहे हैं वह उनकी देखभाल बेहतर ढंग से करेगी। शुरूआती आठ-दस साल तो ठीक बीते लेकिन कुछ साल से अन्नदाता कराह रहा है। किसानों को राहत देने के लिए तत्काल कोई कारगर,हितकारी प्रयास करने की आवश्यकता है। और मुझे भरोसा है कि किसान हितैषी शिवराज कोई बड़ा क्रांतिकारी कदम अवश्य उठाएंगे।