राजस्थान सरकार ने किसानों के पचास हजार रूपये की कर्जमाफी का ऐलान कर दिया है मगर मप्र सरकार कर्जमाफी को तैयार नहीं है। रविवार को ओला वृष्टि से 13 जिलों के करीब साढ़े चार सौ गांवों की फसल बर्बाद हो गई। ठीक दूसरे दिन भोपाल के जंबूरी मैदान पर मु यमंत्री ने किसान महास मेलन में कर्जमाफी से किनारा कर लिया। कर्जमाफी की तुलना भीख से करते हुए शिवराज ने कहा कि कर्जमाफी नहीं किसानों को बीमा राहत देकर नुकसान की भरपाई करेंगे। उन्होने गेहूं का समर्थन मूल्य 2000 रूपये तक करने की घोषणा की। यानी वर्तमान मूल्य से प्रति क्विंटल 200 रूपये अधिक। इस फायदे से किसानों की कितनी भरपाई हो पाएगी भगवान ही जाने। किसान मप्र सरकार की एक बार फिर मप्र सरकार की कुंडली पर राहु के समान बैठ गया है। तामझाम से सरकार ने राज्य के कोने-कोने से किसानों को बसों में भरकर बुलवाया लेकिन स मेलन में मौजूद किसानों का तो जैसे दिल ही टूट गया। उन्हे उ मीद थी कि मु यमंत्री कर्जमाफी का ऐलान करेंगे मगर ऐसा हो न सका। दरअसल,कर्जमाफी की घोषणा न करने के पीछे शिवराज की एक बड़ी मजबूरी है। और है केंद्र में उनकी अपनी पार्टी की सरकार। जब कांगे्रस वाली यूपीए सरकार केंद्र में होती थी तब मु यमंत्री को अपना बचाव करने का मुफीद दरवाजा मिल जाया करता था। पूरी सरकार और भाजपा सांसद उस वक्त किसानों के लिए आसमान सिर पर उठाकर दिल्ली तक मनमोहन सिंह सरकार की घेराबदंी किया करते थे। प्रधानमंत्री मोदी जी के आगे ढंग से खड़ा होने में लोगों की हि मत जवाब दे देती है फिर कर्जमाफी या किसानों के हित में अपनी मांगों को मनवा पाना शिवराज के लिए असंभव है। वित्तमंत्री जेटली पहले ही दो टूक कह चुके हैं राज्यों को अपनी जेब से कर्ज मांफ करना हो तो करें मेरे पास कोई न आए। इस साल चुनाव हैं और किसान को मनाए बिना सरकार की नैया पार होने से रही। इसलिए मु यमंत्री को नए-नए जतन करने पड़ रहे हैं। समर्थन मूल्य की खरीदी के लिए राज्य सरकार को करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी,जो केंद्र से मिलेगी कहना कठिन है। मु यमंत्री ने राहत के लिए सरकारी ाजाने को लुटाने का मन तो बनाया है मगर सरकार के पास समय नहीं बचा जो किसानों को राहत समय पर दिलवा पाए। नवंबर के हिसाब से चा से पांच महीने का समय बचा है। उसके बाद आचार संहिता। सरकारी अफसर और निचला अमला पहले से ही सरकार के हुकुम बजाने पंद्रह घंटे जुटा है,कोई नया काम अब कैसे होगा? चुनाव की तैयारियों का बोझ अलग से। यानी शिवराज सरकार के लिए वक्त बेहद चुनौती भरा है।  मप्र का किसान पिछले कुछ वर्षों से प्राकृतिक आपदा की मार झेलने को विवश है। और केंद्र एवं राज्य सरकार की उदासीन नीतियों के कारण उसका जीवन घनघोर संकट में पड़ गया है। वर्ष 2015 से लेकर 2017 का साल किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ लेकर टूटा और अब वर्ष 2018 का दूसरा मास किसानों की कमर तोडऩे पर आमादा है। मु यमंत्री ने किसानों की दशा को बदलने के लिए ईमानदारी से काफी प्रयास किए मगर तमाम प्रयासों के बावजूद किसानों के चेहरे पर वैसी खुशी नहीं ला पाए जिसकी उ मीद उन्हें है। जो किसान शिवराज पर दिल-ओ-जान से फिदा थे,अब कुछ अरसे से वे उनसे नाराज हैं। किसानों को मनाने के लिए सरकार ने अब तक कई जतन किए मगर उसे कोई खास सफलता नहीं मिल पाई है। भावांतर भुगतान योजना राज्य सरकार ने बढ़ चढ़कर चलाई फिर भी किसान मानने को तैयार नहीं हैं। पहली बार ऐसा वातावरण निर्मित हो रहा है जब किसान की भृकुटी तनी की तनी है। मंदसौर गोलीकांड की घटना और उसके बाद जेल लॉकप में कपड़े उतरवा कर किसानों की पिटाई जैसी घटनाएं वह भूला नहीं है। किसानों का ध्यान बांटने के लिए सरकार ने नर्मदा के बाद एकात्म यात्रा का भी सहारा लिया। दरअसल, मु यमंत्री की मंशा में कोई कमी नहीं है लेकिन योजनाओं का लाभ किसानों तक शासकीय अमला नहीं पहुंचा पाया। पटवारी-आरआई से लेकर एसडीएम तक किसानों के प्रति वैसी समानुभुूति नहीं जता पाए जैसी उनके मु यमंत्री में है। भ्रष्टाचार में सिस्टम इस तरह मदमस्त है कि उसे किसी की चिंता नहीं है। मप्र पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही चला जा रहा है। सरकार के उनके वरिष्ठ मंत्री रहे बाबलूलाल गौर विधानसभा सदन में कह चुके हैं कि सरकार कर्ज लेकर घी पी रही है। हाल ये है कि कर्ज का बोझ आम नागरिकों पर है। सरकार का खजाना खाली है और ऐसे में प्राकृतिक आपदा से लड़-मर रहे किसानों के साथ खड़ा होना वोटबैंक के लिहाज से उसकी मजबूरी है। पिछले साल सूखा राहत के लिए मु यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री जेटली से मिलकर किसानों के लिए सूखा राहत की जितनी राशि मांगी उसकी आधी भी नहीं मिली। मोदी को मिशन 2019 जीतने की चिंता है। देश की चिंताजनक अर्थव्यवस्था को देखते हुए सरकार राज्यों को फिजूलखर्ची के लिए एक पैसा देने पहले ही इंकार कर चुकी है। अब समय आ गया है कि मप्र सरकार किसानों की सं पूर्ण कर्जमाफी की घोषणा करने का साहस दिखाए। कर्जमाफी भीख मांगने जैसा है फिर भी किसानों को उसकी जरूरत है। आगामी बजट सत्र में शिवराज सरकार को पूरा फोकस किसानों पर केंद्रित हो सकता है। देर सवेर सरकार को कर्जमाफी का ऐलान करना पड़ेगा। हो सकता है भाजपा ने इसे अपने 2018 के घोषणा पत्र के लिए बचाकर रखा हो मगर कांगे्रस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ तो यह कहकर बाजी मार चुके हैं कि सत्ता में आए तो कांगे्रस किसानों का कर्जा माफ करेगी। शिवराज सरकार पर इनदिनों भारी दवाब होगा। मेरा माना है कि जीरो प्रतिशत ब्याज पर मप्र सरकार ने किसानों को कर्ज दिलावाए लेकिन कर्ज तो फिर भी है। इसलिए कोई बड़ा कदम उठाना ही पड़ेगा। वर्ष 1990 के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता स्व. सुंदरलाल पटवा ने कांगे्रस शासन को उखाड़ फेंकने के लिए चुनाव में नारा दिया था कि सुई से लेकर टेक्ट्रर तक जितना भी कर्ज किसानों पर होगा सरकार बनीं तो हम माफ करेंगे। पटवा के इस नारे ने अपना जोरदार असर दिखाया था और मप्र में भाजपा सरकार बंपर बहुमत से बनीं। पटवा जी मु यमंत्री बने। हालांकि सरकार बनने के बाद पटवा जी ने किसानों के साथ किए अपने चुनावी वादे को अक्षरश: पूरा नहीं किया। महज ढाई साल में बाबरी मस्जिद कांड के कारण पटवा सरकार राष्ट्रपति शासन के चलते गिर गई। पटवा के नारे ने उन्हें किसानों का सबसे बड़ा हमदर्द बना दिया था। वे जीवनभर किसानों के बीच काफी लोकप्रिय रहे। ऐसा ही कुछ शिवराज को करना चाहिए।