अनुसूचित जाति और जनजाति एक्ट कानून में देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले के विरोध में एक विशेष वर्ग कोहराम मचा रहा है। जिस दिन से सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून में तत्काल गिर तारी पर रोक लगाने का आदेश देकर पुराने कानून को खत्म करने का फैसला सुनाया,उस दिन से उसे बदलवाने के लिए दलित-समाज के लोगों में आक्रोश की ज्वाला धधक रही है। विरोध प्रदर्शन में अलग-अलग राज्यों में दर्जन भर बेगुनाहों की जान चली गई। अकेले मप्र में दो गुटों के बीच हुए संघर्ष में पांच लोगों की मौत हो गई। बिहार,यूपी सहित कई राज्य हिसंक भीड़ के उपद्रव के कारण जल उठे। देश में सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय के विरूद्ध एक विशेष समुदाय का गैर कानूनी ढंग से नंगा खूनी नाच हरगिज बर्दाश्त नहीं है। यदि ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर मुसलमानों ने ऐसी ही आगजनी और हिंसापूर्ण कदम उठाया होता तो इसे राजनीतिक दल सा प्रदायिक रंग देने का मौका तलाशते मगर यहां दलितों द्वारा देश में मचाए जा रहे उत्पात को केंद्र सरकार डंके की चोट पर समर्थन देती नजर आई। देश के कानून मंत्री विद्वान रविशंकर प्रसाद ने कहा -सरकार कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार दलितों के समर्थन में है। कानून मंत्री ने दलितों के प्रति भाजपा के दलित प्रेम दिखाने के लिए पत्रकारों के सामने खूब लार टपकाई। मुद्दा करोड़ों दलितों के वोटबैंक से जुड़ा है,इसलिए कांगे्रस, बसपा, ममता बनर्जी सहित कोई दल सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करने से बच रहे हैं। उन्हें भय है कि कोर्ट का आदेश मंडल कमीशन की कहानी को उनके साथ कहीं दोहरा न दे। राजनीतिक दलों की मजबूरी है,इसलिए उनसे क्या उ मीद की जाए। ट्रिपल तलाक को मुस्लिम महिलाओं के स्वाभिमान और आत्मस मान के खिलाफ बताकर केंद्र सरकार ने इसे खत्म करने का दांव मुस्लिम वोटबैंक में सेंधमारी के लिए चला। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित सभी मुस्लिम संस्थाओं ने जब इसे उनके धर्म में जबरन दखल देने का दावा किया तो भाजपा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स मान करने का बात कहकर जश्न मनाती रही। एससी-एसटी एक्ट में तत्काल गिर तारी पर रोक लगाने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की जितनी सराहना की जाए वह कम होगी। एक काला कानून खत्म करके सुप्रीम कोर्ट ने नई ईबारत लिखी है। पहले इस एक्ट के तहत तत्काल गिर तारी का प्रावधान था,जिसे कोर्ट ने खत्म कर दिया है। देश आजाद होने के बाद हमारी संसद ने 11 सितंबर 1989 को अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम पारित किया था। यह एक्ट इन वर्गों के स मान,स्वाभिमान और उत्थान के साथ उनके हितों की रक्षा के लिए विशेष रूप से बनाया गया था। इस अधिनियम की उपधाराओं में व्यक्ति को छ: माह से अजीवन कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। दलितों के हितों के लिए बनाए गए इस कानून का समय के साथ दुरूपयोग ज्यादा होने लगा। सर्वोच्च अदालत ने बरसों इस मामले के गुण-दोष के बाद ऐसा पाया होगा,इसीलिए उसे काला कानून खत्म करने का निर्णय लेना पड़ा। भारतीय मूल संविधान में दलितों के हितों के लिए बहुत सारे प्रावधान निहित किए गए हैं। पहली से लेकर उच्चतम शिक्षा, सरकारी नौकरी में आरक्षण ,आर्थिक सहायता उसे मिल रही है। दलितों की जीवनशैली में तेजी से बदलाव हो रहा है। स्कूल में पढऩे वाले विघार्थियों में कोई भेदभाव नहीं रहता,लेकिन राजनीति उन्हें साथ जीने नहीं देना चाहती। असली फसाद की जड़ यही है। जिस प्रकार राजा राममोहन राय ने सती प्रथा समाप्त करके नारी जाति को नया जीवन दिया, वैसे ही ट्रिपल तलाक का खत्म होना है। दलित अब पहले की तरह कमजोर,लाचार और गरीब नहीं है,उसके जीवन स्तर में काफी सुधार हो चुका है। देश में एक देश -एक कानून की व्यवस्था होनी चाहिए। आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान करने का वक्त आ गया है। बैशाखी के सहारे हमाी सरकारें दलितों को पंगु बनाए रखना चाहतीं हैं,उन्हें यह बात समझ लेनी चाहिए। किसी की शिकायत मात्र से आरोप सिद्ध हुए बिना,उस व्यक्ति को गिर तार करना न्याय सिद्धांत के विपरीत है। यह हमारे कानून में एक बड़ा दोष था,जिसे सर्वोच्च अदालत ने दूर करके मौलिक अधिकारों को शक्ति प्रदान की है। संविधान में आरक्षण व्यवस्था का प्रावधान अनंतकाल के लिए नहीं किया गया है। इसलिए राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर राजनीतिक रोटी सेंकने से बचना चाहिए। केंद्र सरकार ही जब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का गलत ठहराने लगेगी तो संवैधानिक संकट पैदा होने का खतरा बढ़ेगा। कोई जाति या धर्म छोटा-बड़ा नहीं होता। इसलिए किसी भी एक वर्ग विशेष को इतनी स्वतंत्रता भी मिलना संवैधानिक अधिकारों के लिए उचित नहीं है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका लगाई है, आगे देखते हैं। सुप्रीम कोर्ट और सरकारों में सीधा टकराव लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। अनुचित,अप्रंसागिक कानून खत्म होने ही चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे एतिहासिक निर्णय आगे भी लेने होंगे,क्योंकि काला कानून खत्म करने राजनीतिक दलों के बूते की बात नहीं रही। एससी-एसटी एक्ट में गिर तारी पर रोक के बाद इस वर्ग के स मान, हितों की रक्षा पर कोई आंच न आए,ऐसी उ मीद हमे है।