मुद्दा- सर्वे के बाद समिति का स्वांग

मध्यप्रदेश में कांगे्रस पार्टी ने सांप-सीढ़ी का खेल एक बार फिर शुरू कर दिया है। विधानसभा चुनाव को लेकर दिल्ली हाईकमान ने प्रदेश चुनाव समिति बनाई है,जिसका औचित्य समझ से परे है। राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी अपने भाषणों में बड़े जोर शोर से कहते हैं कि इस बार ईमानदारी से टिकटों का वितरण होगा। उनकी माने तो पार्टी द्वारा कराए गए सर्वे में आए नामों पर ही केवल पार्टी विचार करेगी। लेकिन शुक्रवार को चुनाव समिति के ऐलान को देखते हुए अब राहुल का दावा सांप-सीढ़ी का खेल बन गया है। कांगे्रस यदि सर्वे को आधार बनाती है तो पारदर्शिता और योग्य जिताऊ चेहरों को टिकट मिलने की उम्मीद ज्यादा रहेगी वरना चुनाव समिति कबाड़ा कर देगी। प्रदेश चुनाव समिति की बैठकों में प्रत्याशियों के पैनल बनाने को लेकर समिति के नेताओं और उनके समर्थकों में जूतम-पैजार होगी सो अलग। आश्चर्य की बात है कि जब सिर्फ सर्वे में आए नामों को पार्टी टिकट देने का इरादा कर चुकी तो फिर इस चुनाव समिति का औचित्य ही कहां रह जाता है। तीन महीने बाद नवंबर में चुनाव होने हैं और हाईकमान विवादों से बचने की बजाय विवादों की भठ्ठी में घी और कोयला दोनो खुद ही डाल रहा है। पंद्रह वर्षों से लगातार विपक्ष में होकर भी कांगे्रस ने कुछ भी सबक नहीं सीखा। यह तमाशा कांगे्रस का हर कार्यकर्ता समझ चुका है कि पेंच फंसाने के लिए चुनाव समिति बहुत अच्छा मैदान है। चुनाव समिति में पार्टी हाईकमान ने कई प्रकोष्ठों के अध्यक्षों को शामिल नहीं किया। चुनाव समिति में शामिल लोग एक-एक टिकट के लिए आपस में लड़ेंगे और सर्वे से आए नामों की चटनी पिस जाएगी। ऐसा हुआ तो फिर हो गया राम नाम सत्य....। दिल्ली हाईकमान की मति भगवान ने हर ली है इसीलिए उल्टे-पुल्टे निर्णय हो जाते हैं। ऐसा ही एक बड़ा मूर्खतापूर्ण निर्णय राज्यसभा के लिए उपसभापति चुनाव में कांगे्रस ने बीके हरिप्रसाद को प्रत्याशी बनाकर लिया। राज्यसभा में पचास सांसद होने के बावजूद राहुल गाधी ने हरिप्रसाद को चुना। जीत के लिए जरूरी 125 वोट में हरिप्रसाद को 105 वोट मिल गए वरना कांगे्रस के रणनीतिकारों ने थू-थू कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। समय खराब चल रहा हो तो दिमाग को अच्छी बातें नहीं सूझती। लेकिन भाजपा के दिमाग की दाद देनी पड़ेगी,जिसने 50 सांसदों के बाद भी हारी बाजी पलट कर कांगे्रस की नाक काट ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने देखा कि शिवसेना, टीडीपी,अकाली दल, टीआरएस जैसे कुछ दल उससे नाखुश चल रहे हैं तो उसने चतुराई से वरिष्ठ पत्रकार जेडीयू सांसद हरिवंश को उपसभापति पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया। जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार का मन इनदिनों कुछ मुद्दों को लेकर भाजपा से खट्टा है,इसलिए 2019 के आम चुनाव की बिसात बिछाने की दूरदर्शी नीति अपनाकर प्रधानमंत्री मोदी ने यहां अपनी पार्टी का नहीं बल्कि सहयोगी दल के नेता को आगे खड़ा कर दिया। अमित शाह ने ऐसी चाल चली कि नाराज चल रहे सहयोगी दलों यहां तक कि बीजू जनता दल ने हरिवंश को अपना समर्थन दे दिया। इसे कहते हैं राजनीतिक कौशल। कांगे्रस को ये बातें पल्ले क्यों नहीं पड़तीं? बीेके हरिप्रसाद को उम्मीदवार बनाना किसी भी दृष्टि से सूझबूझ भरा निर्णय नहीं कहा जाएगा। कांगे्रस ने सोचा होगा कि दक्षिण प्रांत के नाम पर शायद एआईडीएमके और डीएम,टीडीपी, टीआरएस और वाईएसआर कांगे्रस के सांसदों का समर्थन हरिप्रसाद को मिलेगा, लेकिन उसने बाकी समीकरणों का नजरंदाज कर दिया। बेहतर यह होता कि कांगे्रस खुद आगे बढ़कर टीएमसी या एआईडीएमके से किसी को उम्मीदवार बनाने का आग्रह कर समर्थन का ऐलान कर देती लेकिन उसकी मति फूठ चुकी है। ममता बनर्जी, जयललिता की पार्टी या तेलंगाना के मुख्यमंत्री टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर की कड़वाहट को दूर करने का यह एक अचूक दवा कांगे्रस ने अपनी अकड़ में गंवा दी। कांगे्रस अध्यक्ष की मति में राहु समाया हुआ है। क्षेत्रीय दलों के आगे शाष्टांग होने की दशा में भी राहुल गाधी खुद को सुपरमैन समझने की भूल कर रहे हैं। ऐसे ही हाल रहा तो प्रधानमंत्री मोदी के अश्वमेधी रथ को रोक पाना असंभव होगा। मप्र के विधानसभा चुनाव को लेकर राहुल गाधी को चाहिए कि वे कमलनाथ से सीधे सीधे कह दें कि जाओ और जनता के बीच लाठियां डंडे खाओ, जनांदोलन खड़ा कर जरूरत पड़े तो जेल भी जाओ। तब ही कुछ बात बनेगी। राहुल गाधी ने यह जानते हुए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ही एकमात्र तुरूप का इक्का हैं उन्हें फिर पीछे की सीट पर बिठा दिया है। कमलनाथ बूढ़े हो चुके हैं। दस मिनट बोलने में हाफने लगते हैं। बरसात में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह जनता की भीड़ में वो नहीं समा सकते। और न ही सुबह आठ बजे से लेकर रात तीन बजे तक जनसभाएं ही कर सकते हैं फिर भी नाथ मंडली पूरी ताकत झोंके हुए है। ये अच्छी बात है। कमलनाथ मप्र में कांगे्रस की सरकार क्या प्रेस नोट या टवीटर के भरोसे बना पाएंगे? बड़े-बड़े मीडिया घरानों पर जरूरत से अधिक भरोसा करना क्या चतुराई पूर्ण होगा? जबकि सत्ता के खिलाफ लड़ाईयां हमेशा ही मध्यम और लघु समाचार पत्रों ने ही लड़ी है। एसी कमरे में खुद को बंद कर बैठे कमलनाथ के पास आज सर्वाधिकार है तो फिर उन्होने राहुल गाधी से यह क्यों नहीं कहा कि मप्र में चुनाव समिति की कोई जरूरत नहीं है। वरना हमारे सर्वे पर अपने ही कार्यकर्ता सवाल खड़ा करेंगे। मप्र कांगे्रस को पहली बार इतना शक्तिशाली प्रदेश अध्यक्ष मिला है। मगर उसका कितना लाभ कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में मिल पाएगा, भगवान ही जाने।