विश्व क्षितिज पर अटल बिहारी वाजपेयी जी नामका सूरज अस्त हो गया। अटल जी को उनके अटल सिद्धांतों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उन्होने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा के लिए अर्पित किया। भारतीय इतिहास के वे इकलौते ऐसे राजनीतिज्ञ हैं जिनकी लोकप्रियता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल जी नेहरू और लौहनेत्री इंदिरा गांधी से किसी मायने में कमतर नहीं आंकी जा सकती। नेहरूजी जीते जी उनकी योग्यता का लोहा मानते रहे।

पूरी दुनिया में अटलजी के उदारवादी छवि की चर्चा होती रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा में गढ़े अटलजी गांधीजी के आदर्श से बहुत प्रभावित रहे। सिद्धांतों के लिए मर-मिटने वाले अटलजी को आप सिद्धांत गांधी कह सकते हैं। क्योंकि उनका संपूर्ण जीवन गांधीवाद से प्रेरित रहा। सामान्य सी वेशभूषा में दिखने वाले अटलजी का व्यक्तित्व असाधारण,अद्वितीय और अलौकिक है। राजनीति में गैर कांगे्रसवाद संस्थापक सदस्यों में वे एक थे। जिन्होने इंदिरा गांधी को खुलेमन से दुर्गा का अवतार बताकर उनका कभी मान बढ़ाया तो कभी आपातकाल के विरोध में जेल भी गए। जनसंघ की स्थापना से लेकर भाजपा को देश की सत्ता का केंद्र बनाने में अटलजी की भूमिका मेरी दृष्टि में सबसे अधिक रही।

क्योकि उनकी कद काठी वाला और कोई दूसरा जनप्रभावी नेता भाजपा में आज तक नही हुआ। सत्ता के लिए बल्कि लोकतंत्र की मान्य परंपराओं के लिए अटलजी का जीवन पथ अपने आप में गीता के समान है जो आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणादायी है। उनका देहावसान राष्ट्र के लिए कभी न भरने वाली क्षति है लेकिन भौतिक काया की कष्टकारी जीवा के लिए यह अच्छा ही रहा। क्योंकि पिछले दस वर्षों से अटलजी हाड़-मास का पुतला बनकर सांस ले रहे थे। न मुख से कोई शब्द फूटते ना ही स्मृति उनका साथ दे रही थी। 94 वर्ष की आयु में राजनीति का महायोद्धा चिरनिद्रा में चला गया। उनकी छत्रछाया में चाय बेचना वाला व्यक्ति आज देश का प्रधानमंत्री है। 2004 का आम चुनाव महज कुछ सीटों से हारने के बाद अटलजी ने दूसरी पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त करने का निश्चय कर सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया। 2009 के बाद उनकी ओजस्वी वाणी लोप हो गई और तभी से अटलजी का जीवन अज्ञातवास में चला गया।

वास्तव में मौत से उनकी ठनी रही किंतु नश्वर शरीर को छोड़कर पवित्र आत्मा आखिरकार चली ही गई। जिस काल के कपाल पर अटलजी हमेशा अपनी कविताएं लिखते और मिटाते, वही उन्हें हमेशा के लिए इस लोक से ले गया। रामभक्त और भगवाभक्त होने के बावजूद अटलजी का जीवन सबके लिए एक जैसा सरल एवं काफी उदारवादी था। उनकी इसी उदारता एवं समावेशी दृष्टि के कारण वे देश के सर्वमान्य नेता बने। एक ऐसे नेता जिसे उनके धुर विरोधी भी आदर देते। राजनीति में भाषाई संतुलन की सीमाएं उन्होने कभी नहीं लांघी फिर चाहे संघर्ष कितना ही बड़ा क्यों न रहा हो। अटलजी ने प्रतिष्ठा के जिस शिखर पर खुद को जीवनकाल तक बनाए रखा, उसके आसपास पहुंच पाना बड़ी बात होगी। वर्तमान प्रधानसेवक के लिए तो इसे छू पाना मेरी दृष्टि में असंभव है। अटलजी ने जिस ऊंचाई को छुआ उसके लिए बीस साल प्रधानमंत्री पद पर बने रहना कोई मायने नहीं रखता। विश्व और भारत की जनता से उन्हें जो प्यार-सम्मान मिला वह प्रधानमंत्री होने का नहीं बल्कि अटलबिहारी के कारण है। गाधी-नेहरू के बाद इंदिरा के राजनीतिक सामा्रज्य को जब कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं था तब अटलजी अपने प्रखर क्रांतिकारी विचारों से सत्ता की नींव अकेले हिलाकर रख देते थे। लेकिन शब्दों की मर्यादा वे कभी नहीं भूले।

उनके समान सिद्धांतवादी कोई दूसरा राजनीतिज्ञ पूरे भारतवर्ष में नहीं दिखता। लोकतंत्र की परंपरा से बढ़कर उनके लिए कोई पद या वस्तु नहीं थी। इसी परंपरा की रक्षा के लिए एक ऐसा भी वक्त आया जब सिद्धांतों के आड़े आने वाली सत्ता सिंघासन को उन्होने पलभर में ठोकर मार दी। जिसके लिए आज नेता नरसंहार तक के लिए तत्पर हैं। सत्ता से अधिक उनके मन में राष्ट्र के प्रति मोह था। वरना आज की तरह एक वोट से अटलजी की सरकार नहीं गिरती। उन्होने वर्तमान राजनीतिक दलों की भांति वोट खरीदने के लिए सांसदों को न लालच दिया और न ही उन पर अनर्गल दवाब ही बनाया। सौम्य अटलजी ने प्रधानमंत्री रहते ही पाकिस्तान को कारगिल में धूल चटवाई। तो अमेरिका सहित अन्य विदेशी ताकतों के दवाब की परवाह न करते हुए भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने के लिए पोकरण परीक्षण का ऐतिहासिक निर्णय लेकर दुनिया के समक्ष भारत की ताकत का लोहा मनवाया। क्या मौजूदा प्रधानसेवक ऐसा कर पाएंगे? वो अटलजी का ही करिश्माई व्यक्तित्व है जिसने 24 सहयोगी दलों को साथ लेकर पांच साल सरकार चलाई। जो इंदिरा किसी के आगे न झुकी उन्हें अटलजी के सामने विवश होना पड़ा। पडित जवाहरलाल नेहरू उनकी ईमानदार राजनीतिक शैली और योग्यता की सर्वत्र प्रशंसा यूं ही थोड़े ही करते थे। उस दौर की राजनीति में आज जैसी गंदगी नहीं थी। आज के दौर में कोई प्रधानमंत्री विपक्ष के नेता की खुलकर तारीफ क्या कर सकता है? सत्ता अहंकार उन्हें कभी छू न पाया।

कांधार विमान अपहरण और बाबरी बिध्वंस की घटनाओं ने अटलजी की योग्यता पर जरूर सवाल खड़े किए मगर यह भी सत्य है कि बाबरी विध्वंस मामले से अटलजी ने खुद को हमेशा अलग रखा। यहां तक कि भाजपा के समर्थन में उनका कोई बयान खुलकर नहीं आया। गठबंधन दलों को साधने में वे सिद्धहस्त थे तो गलतियों पर अपनो को लताड़ लगाने में वे पीछे नहीं रहे। पत्रकारिता का अनुभव उनके हमेशा काम आता। गुजरात में हुए गोधरा कांड पर मीडिया के समक्ष अटलजी ने ही तब के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की चेतावनी दी थी। अविवाहित रहकर जीवन का एक-एक क्षण उन्होने लोकतंत्र, राष्ट्रसेवा के लिए अर्पित किया। आज तो राजनीति का उद्येश्य केवल सत्ता प्राप्ति हो गया है। उसके लिए विरोधियों की हत्या करानी पड़े तो परहेज नहीं।

Source : विजय शुक्ला