विजय शुक्ल
देश के पूर्व प्रधानमंत्री  अटलबिहारी वाजपेयी ने अपना संपूर्ण जीवन संघ, जनसंघ और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी को मजबूती देने में अर्पित किया। और दधीचि बनकर महाप्रयाण पर निकले। अटल जी ने अपनी कविता में भाजपा की जय के लिए जिस दधीचि की हड्डियों को गलाने का आळवान देश से किया, उसकी शुरूआत भी खुद से कर गए।  93 वर्ष में अटलजी का निधन नियति की इच्छा थी मगर अपने पीछे वे एक आलौकिक विरासत छोड़कर गए हैं जो देश की भावी पीढिय़ों के लिए अनमोल धरोहर रहेगी। अटलजी की इसी धरोहर को संरक्षित बनाए रखने का कार्य प्रधानमंत्री मोदी सहित पूरी भाजपा ने तेज कर दिया है। इसकी शुरूआत मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार को की। अटलजी जहां पढ़े उस स्कूल, भोपाल हबीबगंज स्टेशन का नाम अटलजी के नाम पर और विश्वस्तरीय लाईब्रेरी निर्माण कराने की ऐलान मुख्यमंत्री ने मीडिया से करते हुए अपनी अगाध श्रद्धा-आस्था दिखाई।

सवाल तो करुणा शुक्ला से भी पूछा जाएगा कि जिन चाचा  जी के प्रति वे इतना आदर और संवेदना दिखाकर बीजेपी को कोस रही हैं, खुद उन्होंने अटलजी की कितनी सुध ली ?

अटलजी के सर्वाधिक पसंदीदा नेतओं में शिवराज भी एक हैं। जिस दौर मेंं अटल जी का निधन हुआ है, वह भाजपा के सामने कई तरह की गंभीर चुनौतियां लेकर खड़ा है। इसी साल मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ और मिजोरम के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं तो अगले साल आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव सहित मई में आम चुनाव की सबसे बड़ी चुनावी महाभारत भाजपा के सामने है। जिस भाजपा को अटल-आडवाणी युग ने शिखरता प्रदान की, उसे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने करिश्माई नेतृत्व से काफी मजबूती देकर मुख्य विपक्षी दल कांगे्रस को क्षेत्रीय दल में बदलकर रख दिया है। लोकसभा चुनाव में 282 सीटें जीतने का सुनहरा अध्याय मोदी और उनके सारथी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मिलकर लिखा। इन्हीं नेताओं के राजकाज में भाजपा ने दस करोड़ पार्टी कार्यकर्ता बनाने का नया कीर्तिमान रचकर दुनिया को अचंभित किया।

मगर 2019 के आम चुनाव भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने में संदेह पैदा कर रहे हैं। इसके लिए एनडीए के सहयोगी दलों में उपजता असंतोष और सच कहें तो बहुत हद तक केंद्र सरकार द्वारा जनता पर थोपी गईं अनाप-शनाप नीतियां जिम्मेदार हैं। साढ़े चार वर्षों में मोदी का ग्राफ पूरी दुनिया में बहुत तेजी से बढ़ा है लेकिन उनकी सरकार का ग्राफ देश के जनमानस में रूपए के समान नीचे लुढ़कता जा रहा है। यूपी और राजस्थान मे हुए लोकसभा उपचुनाव की हार ने भाजपा को बेचैन कर दिया । इसी चिंता को दूर करने के अभियान को सफल बनाने अमित शाह जीतोड़ कोशिशें कर रहे हैं। जनमानस के वर्तमान रूझान से यह साफ है कि अगले आम चुनाव में भाजपा अकेले अपनी दम पर बहुमत सिद्ध नहीं कर पाएगी। उसे सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ेगा। यह भी तय है कि क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व बढ़ेगा। यानी मोदी और शाह को छोटे और क्षेत्रीय दलों का विश्वास आम चुनाव होने तक बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। मुस्लिम-हिंन्दू और दलित बनाम सवर्ण के राजनीतिक मुद्दों के अलावा मोदी ने नया गेम प्लान पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर तैयार किया है।

किंतु प्रमोशन में आरक्षण और एसटी एससी एक्ट में संशोधन जैसे निर्णय ने जहां एक तरफ दलितों को उकासाया है वहीं सवर्ण वर्ग खार खाए चल रहा है। टीवी चैनल द्वारा किए गए चुनावी सर्वे में मप्र, छग और राजस्थान भाजपा के हाथ से फिसलते दिख रहे हैं।  लिहाजा भाजपा ने सवर्ण खासकर ब्राम्हण वोटबैंक की नाराजगी को दूर करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयीजी की शरण में जाने मन बना लिया है। मुख्यमंत्री शिवराज ने मप्र में अटलजी के नाम का वातावरण निर्मित करने का अभियान तेज कर दिया है। अटलजी के अस्थिकलश को भाजपा विधानसभा और यदि जरूरत पड़ी तो बूथ स्तर तक ले जाने का निर्णय रणनीति बना चुकी है। यानी फानी दुनिया को छोड़ चुके अटलजी की पंक्तियां उन्हीं पर लागू हो गई हैं। उन्होने लिखा था आहूति बाकी यज्ञ अधूरा, अपनो के विघ्नों ने घेरा। अंतिम जय का वज्र बनाने,नव दधीचि हड्डियां गलाएं। निसंदेह अगला आम चुनाव मोदी और भाजपा के लिए ऐसा है कि उन्हे नव दधीचि की हड्डियों से वज्र बनाना पड़ेगा ताकि भाजपा 2019 में सत्ता पर काबिज हो पाए। दस साल से मृत्यु शैया पर पड़े अटलजी के पारसरूपी व्यक्तित्व को ही भाजपा दधीचि बना रही है। उनके अस्थिकलश को देशभर में घुमाकर भाजपा खुद को यदि व्रज बना लेती है तो कांगे्रस सहित अन्य पार्टियों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।

नवंबर में होने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव को भाजपा जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। अटलजी के अस्थिकलश के जरिए शिवराज मप्र में अपने खिलाफ बिगड़ते चुनावी माहौल को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहेंगे, ताकि कांगे्रस का सूपड़ा साफ हो जाए। अटलजी पर केंद्रित लघु फिल्में, साहित्य संग्रह बन रहे हैं। भाजपा सफल हुई तो मप्र में लगातार चौथी बार भाजपा सरकार बन जाएगी। कांगे्रस पार्टी ने निधन पर अटलजी के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित किए, प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष कमलनाथ ने पार्टी मीटिंग खत्म कर दी। अटलजी के निधन से कांगे्रस को चुनावी हवा बदलने का भय सता रहा है। फिलवक्त उसके नेताओं को कुछ नहीं सूझ पा रहा है। दरअसल, शून्य को सौ रूपया बनाने की कला में भाजपा पारंगत हो चुकी है जबकि कांगे्रस एक और एक ग्यारह बनाना भूल गई है।

अटलजी भारतीय राजनीति के इकलौते ऐसे राजनीतिज्ञ हैं जिन्हें साहित्य और सियासत दोनो में महारत हासिल थी। अपनी कविताओं से वे पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर नई क्रांति का ऐसा जोश भर देते कि कार्यकर्ता घनघोर संघर्ष के मार्ग को बड़ी सुगमता से पार कर लेता। अटलजी के दस वर्षीय मौनकाल को छोड़ दें तो बाकी साठ साल उन्होने भाजपा के लिए दिन-रात एक कर दिया। मोदी के कद का कोई नेता आज जब किसी पार्टी के पास नहीं है,अटलजी तो अतुलनीय हैं।

Source : विजय शुक्ल