विजय शुक्ल
लगता है पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन का दुख उनके परिजनों से अधिक प्रधानसेवक और पूरी भाजपा को है। ऐसा नहीं है तो अटलजी के परिजन देशभर में भाजपा द्वारा निकाली जा रही अटलजी की जिस अस्थिकलश यात्रा को महज राजनीतिक प्रोपोगंडा बताकर उससे क्षुब्ध न होते। बल्कि वो लोग भी इसे भाजपा की अपने नेता के प्रति सच्ची श्रद्धा बताकर उसे लोकव्यापी अवश्य बनाते। लोकसभा 2019 चुनाव के साथ मप्र,छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर अपनी पूरी ताकत लगाए चल रहे प्रधानसेवक और उनके चेले अटलजी के पार्थिव देह की अस्थियां देशभर में घुमा रहे हैं इसी बीच अटलजी की भतीजी करूणा शुक्ला ने आग का एक बड़ा गोला भाजपा पर दागकर उसकी सद्भावना,श्रद्धा और आस्था पर प्रश्रचिन्ह खड़े कर दिए हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि वाजपेयी परिवार के मुखिया के परिजन उनकी अस्थिकलश यात्रा पर तीखा रोष प्रकट कर उसे उनका अपमान या कहें उपहास ठहरा रहे हैं लेकिन परिजनों से इतर भाजपा नेता भाजपाशाशित राज्यों के गांव-गांव में जाकर अटलजी के तप की राख और दधीचिरूपी अस्थियों को घुमाने में लगे हुए हैं। दिल्ली पार्टी मुख्यालय पर समारोह पूर्वक अस्थिकलश वितरित करने से लेकर श्रद्धांजलि सभाओं को लेकर टीवी चैनलों पर जिस तरह की खबर-वीडियो दिखाए जा रहे हैं,उसे देखकर अटलजी की भतीजी के कथन पर सहज विश्वास होता है। इंसान की आवश्यकता चाहे जिस से जो करा डाले कम है। तो भाजपा अस्थिकलश को किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए गली-गली घुमा रही है?  भारत नहीं बल्कि विश्व के लोकप्रिय राजनेता, राजनीतिक मनीषी सिद्धांत गांधी और इससे कहीं बढ़कर भाजपा के पितामह अटलजी की अस्थिकलशों को जितनी गंभीरता एवं गरिमा के साथ लेकर चलना चाहिए इसका विपरीत हो रहा है।

अस्थिकलश पर सैकड़ों जन अपने श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं तो मंच पर बैठे मंत्री-विधायक और पदाधिकारी बत्तीसी दिखा ठहाके लगा रहे हैं। गप्प मार रहे हैं। ठिठोलियां कर रहे हैं। वे लोग कैसे भूल सकते हैं कि आज सत्ता के जिस सिंघासन पर वे बैठे हैं, वहां तक पहुंचने में श्यामाप्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, कुशाभाऊ ठाकरे, अटलजी, लालकृष्ण आडवाणी सरीखे न जाने कितने नेताओं ने संपूर्ण जीवन खपाया है। अटलजी ने गुजरात को वर्ष 2002 में राजधर्म निभाने की जो शिक्षा दी थी उनके मरते दम खुद निभाते रहे। उनके आचरण सिद्धांत से किसी ने सबक सीखा होता तो प्रभुता में विनम्रता होती। धर्म, जात-पात से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना जाता। खैर, मूर्खों को जब ब्रम्हाजी ज्ञान नहीं दे पाए तो हम क्या हैं? भाजपा की कथनी-करनी में फर्क दिखने लगा है।

किसी के प्रति सद्भाव प्रकट करने में सादगी, सहानुभूति होनी चाहिए ,आडम्बर या अतिवाद व्यर्थ है। अटलजी की भतीजी ने चाचा अटल के भौतिक पराभव के विगत दस वर्षों का उल्लेख करते हुए पूछा कि दस साल तक जब अटलजी गुमनामी का जीवन जीने को मजबूर थे तब किसी नेता को उनकी याद क्यों नहीं आई? भाजपा के पोसटर-बैनरों और विज्ञापनों में अटलजी का नाम इन वर्षों में कभी नजर नहीं आया। अब उनके निधन के बाद घोषणाओं का अंबार मुख्यमंत्री लगाए पड़े हैं? डूबते सूरज को कोई भला कहां सलाम करता है? अटलजी के प्रति अचानक नेताओं के सद्भाव की गंगा कहां से बह निकली? महान अटल ने जीवन के दस साल कितनी तकलीफों से लड़कर बिताए होंगे इसका भान कोई नहीं कर सकता।

इस दौरान उन्हें गुरू मानने वाले कितने चेले शिक्षक दिवस पर उनका आशीर्वाद लेने हाजिर हुए? जिस गुरू का आशीष पाकर लोग विधायक-मंत्री, मुख्यमंत्री यहां तक कि प्रधानमंत्री बने, वे मृतशैया पर पड़े गुरू को कितना याद करते थे भाषणों में? ऐसे लोगों को अटलजी का नाम धोखे से भी जुबां पर आया और उसने सुन लिया का डर हावी रहा। जब अस्थिकलश की गरिमा बना नहीं सकते तो फिर उसका उपहास क्यों ? अटलजी के बताए सिद्धांत मार्ग को भाजपा आज भूल गई है? अत्यधिक सम्मान देना शंका को जन्म देता है, इसलिए आप हमेशा जैसे हैं,वैसे ही बने रहें।

भाजपा यह अस्थिकलश राजनीतिक फायदे के लिए नहीं निकाल रही हैं लेकिन वह विरोधियों तथा आमजन में बन रही धारणा को मिटा तो नहीं सकती। वर्ष 2004 आम चुनाव हारने पर संघ के दवाब में जिस भाजपा ने अपने पितामह का इस्तीफा मांग लिया था उनके निधन पर वही भाजपा उनके चिता की राख से 2019 में होने वाले आम चुनाव और तीन राज्यों के इसी साल हो रहे विधानसभा चुनाव की चिंता दूर करना चाह रही है? इस बात पर तिलमात्र संदेह नहंी है कि अटलजी एक सच्चे राष्ट्रहितैशी, ईमानदार, बेदाग छवि और सर्वमान्य नेता थे, जिन्होने पूरा जीवन राष्ट्र के लिए अर्पित किया किंतु उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू,इंदिरा गांधी,लालबहाुदर शास्त्री या राजीव गांधी की तरह बलिदानी कहना कितना उचित होगा?

इंदिरा-राजीव की प्रधानमंत्री पद पर रहते हत्या कर दी गई। इसलिए देश की जनता में उनके प्रति सहानुभूति और गहरी संवेदना थी। कांगे्रस को इन दोनो दिग्गजों के असामयिक निधन का राजनीतिक फायदा भी मिला। कहीं भाजपा भी सोचती है? अटलजी की मृत्यु स्वाभाविक तौर पर 94 वर्ष में हुई। इसलिए यदि भाजपा उनकी छवि को भुनाने की सोच भी रही है तो राजनीतिक चुनावी चांस कम है। जनता के दिलों पर अटलजी हमेशा राज करते रहेंगे।

सवाल तो करुणा शुक्ला से भी पूछा जाएगा कि जिन चाचा  जी के प्रति वे इतना आदर और संवेदना दिखाकर बीजेपी को कोस रही हैं, खुद उन्होंने अटलजी की कितनी सुध ली ?

Source : विजय शुक्ल