विजय शुक्ल
भारत में रक्षा सौदे में घोटाले का इतिहास बरसों पुराना है। एनडीए नेतृत्व वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार राफेल विमान सौदे को लेकर इनदिनों विपक्षी दलों विशेषकर कांगे्रस पार्टी के निशाने पर है। 21 दिसंबर 1963 को भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए संसद में हुई बहस में प्रचंड समाजवादी राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था- सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित,भ्रस्ट और बेईमान हो गया है,उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ। संसद में दिया गया लोहिया का वह वक्तव्य पचास साल बाद वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक है। भ्रष्टाचार से देश की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता ही है लेकिन प्रत्येक व्यक्ति पर भी इसका विपरीत असर पड़ता है।

रक्षा सौदे में पहली बार घोटाले का अध्याय देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के दो साल बाद सन 1949 में जीप सौदे के साथ खुला था और तब से लेकर आज तक पूर्ववर्ती सरकारों में घोटाले पर घोटाले होते रहे हैं। लेकिन दुनिया भर में तीन बड़े रक्षा घोटालों ने भारत की इज्जत मिट्टी में मिलाई। इनमें से 1987 में हुआ बोफोर्स तोप घोटाला पहला, 1999 में कारगिल युद्ध काल का ताबूत घोटाला और वर्तमान में फ्रांस के साथ हुआ राफेल विमान सौदा है। इन तीन मामलो में भी सबसे ज्यादा घिनौना और निंदनीय ताबूत घोटाला कहा जाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में कारगिल युद्ध के शहीद भारतीय सैनिकों के शवों को सम्मानजनक तरीके से उनके घरों तक पहुंचाने के लिए जिन ताबूतों को सरकार ने खरीदा उसमें घोटाला हुआ। घोटाले की कहानी तहलका कांड के जरिए दुनिया के सामने आई। उस दौर में कांगे्रस विपक्ष में थी। उसने रक्षामंत्री जार्ज फर्नाडीस को इस्तीफा देना पड़ा। राजीव गाधी के प्रधानमंत्री होते हुए सन 1987 में स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत को तोपें बेंची और बात सामने आई कि सौदा हथियाने के लिए कंपनी ने 80 लाख डालर की दलाली बांटी। राजीव गांधी पर आरोप लगे कि गांधी परिवार के करीबी इतालवी क्वात्रोची ने दलाली की।

राजीव गाधी पर ये संगीन आरोप उन्हीें की सरकार में रक्षामंत्री रहे बीपी सिंह के कारण लगे जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने। राजीव गाधी जीते जी इन आरोपों से बरी न हो सके। उनका नाम अभियुक्तों की सूची में रहा जो उनके निधन के बाद हटा दिया गया। इस घोटाले ने 1989 के आम चुनाव में कांगे्रस और राजीव दोनो का राजनीतिक पिंडदान कर दिया। वर्तमान राफेल विमान सौदे को लेकर कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी साफ छवि वाली मोदी सरकार पर ताबड़तोड़ हमले कर सवालों के तीर बरसा रहे हैं। केंद्र की ओर से वित्तमंत्री अरूण जेटली सरकार पर कीचड़ न लगे बचाव में लगे हुए हैं। कांगे्रस अध्यक्ष बार-बार पूछ रहे हैं कि केंद्र राफेल सौदा का विवरण देश से साझा करे लेकिन सौदे के गोपीयता की दुहाई देकर केंद्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। कांगे्रस जानना चाहती है कि सरकार ने कितने में विमान खरीदा क्योंकि वह आरोप लगा रही है कि जिन 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने का सौदा उसने 58 हजार करोड़ में सरकार में रहते किया था महज उतनी राशि मोदी सरकार 36 विमानों के सौदे पर खर्च कर रही है। दरअसल, कांगे्रस अंाकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग कर 2019 आम चुनाव के लिए एक बड़ा मुद्दा मानकर बैठी है। मोदी सरकार की फजीहत हो रही है। जिस सौदे में भारत सरकार के उपक्रम हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट को रखना जरूरी था उसे पूल से बाहर रखा गया।

कांगे्रस आरोप लगा रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीबी उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा दिलाने के लिए सौदा उन्हें सौंपा है। जिन्होने पखवाड़े भर पहले ही कंपनी बनाई। रेडिया पर हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात जनता से साझा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी का राफेल सौदे पर मौनीबाबा बनना उन्हें कटघरे में खड़ा करने जैसा है। वैसे मोदी पहली बार मौन धारण नहीं किए हुए हैं । बल्कि वे हर उस घटना पर यही रूप धारण कर लेते हैं जिन पर उनके पास कुछ बोलने को होता नहीं है या फिर वे बोलने में असमर्थ हैं। मॉब लिंचिंग पर उनकी सफाई सोशल मीडिया के दुरूपयोग के बहाने आई। हालांकि मुजफ्फरपुर, ऊना के बाद कोल गांव की घटनाओं पर जनता को उनसे जवाब की आशा रहेगी। रक्षा सौदे में मोदी सरकार के किसी मंत्री या फिर नेता ने दलाली खाई है या नहीं ऐसे संदेहपूर्ण सवाल तब तक उछलते रहेंगे जब तक सरकार की ओर से इस मामले में संयुक्त संसदीय कमेटी गठित नहीं की जाती। राफेल विमान का रेट सरकार सार्वजनिक क्यों नहीं करना चाहती ? जबकि फ्रांसीसी कंपनी ने इस सौदे की गोपनीयता पर कहा है कि इसे गोपनीय रखने की कोई शर्त नहीं है। तो क्या चोर की दाढ़ी में तिनका असल में विमानों के रेट ही हैं? मोदी जी को सच्चाई बताने आगे आना चाहिए। लेकिन यह तब संभव होगा जब वे नैतिक साहस दिखाकर कहेंगे ये लो प्रमाण, देख लो और जहां चाहे कांगे्रस इसे दिखाकर जांच करा ले। पर ऐसा मुमकिन हो नहीं लगता।

दरअसल, केंद्र सरकार ने अघौषित रूप से यह अध्यादेश पारित कर लिया है कि कोई उस पर कितने ही संगीन से संगीन आरोप क्यों न लगाए जवाब पकौड़ादार ही देंगे। आप ईमानदार, पारदर्शी सरकार चलाने का दावा करते हैं तो यह दिखना भी तो चाहिए। जिन रामलला के नाम पर आप सरकार बना लेते हैं उस मंदिर के निर्माण की कसमें खाते हैं उसकी डेट नहीं बता पाए। महंगाई कब घटेगी..रूपये की इज्जत अमेरिकी डालर के आगे कब तक गिरेगी....सालाना कितने युवाओं को नौकरी मिली.... पंद्रह लाख खाते में कब आएंगे....पेट्रोल डीजल और रसोई गैस के दाम काबू में कब आएंगे...गाय के नाम पर बेगुनाहों की हत्या कब रूकेेगी.... कालाधन अब कब वापस आएगा... माल्या, ललित मोदी, मेहुल और शाह जैसे मौद्रिक दुराचारी भारत कब लाए जाएंगे...आदि सवालों के जवाब देने की बजाय सरकार गार्डन, लॉन, टेरिस, बिरयानी, सूटबूट दिखा रही है। वह ऐसा करके क्या जनता का सामना कर पाएगी। इन आवश्यक बातों के समाधान खोजने को भूल आप जुमलों से दिल नहीं बहला सकते। जनता ने विदेशों की सैर करने के लिए नहीं बल्कि आपको इसलिए चुना है ताकि वही पाप न करें जो कांगे्रस पार्टी ने किए। राफेल विमान को लेकर राहुल गांधी का हमला क्या कांगे्रस को सत्ता के करीब ले जाने में सहायक होगा? फिलहाल तो इसका जवाब है नहीं क्योंकि उन्हें पहले कांगे्रस को जनता के करीब ले जाना होगा। जो बहुत दूर हो चुकी है। कांगे्रस तो घोटाले-भ्रष्टाचार की जननी है।

Source : विजय शुक्ल