सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट संशोधन के फैसले को पलटकर केंद्र सरकार सवर्णों का कोपभाजन बन गई है। देशभर में सरकार की दादागिरी को लेकर विद्रोह सड़कों पर फूट पड़ा है। इसी कड़ी में आज भारत बंद का आह्वान किया गया है। सत्ताधरी दल भाजपा के सवर्ण सांसदों के मन में केंद्र सरकार के अदूरदर्शी कदम को लेकर असहमति तो है लेकिन वे इसका खुलकर विरोध करना तो दूर एक शब्द भी मुंह पर ला नहीं सकते। वजह बताने की जरूरत नहीं क्योंकि कारपोरेट कल्चर में कहावत है बॉस इज आलवेज राइट। खैर, भाजपा हो या कांगे्रस, सवर्ण संासदों और विधायकों की खूब फजीहत हो रही है। लोग घेराबंदी कर सवाल पूछ रहे हैं कि संसद मेेंं उन्होने सरकार के इस अत्याचारीपूर्ण एवं असंवैधानिक कदम पर अपना विरोध दर्ज क्यों नहीं कराया? याद कीजिए जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तारी पर रोक से जुड़ा एक आदेश सुनाया था,तभी अनुसूचित जाति से जुड़े भाजपा के ही कई सांसदों ने इस पर कड़ा एतराज जताते हुए खुलकर विरोध किया था। एडीए सरकार में सहयोगी लोजपा प्रमुख केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के तेवर बगावती हो गए थे। भाजपा संासद उदित राज ने भाषणों के मास्टर को इसे बदलने की नसीहत तक दे डाली थी। अनुसचित जाति एवं अनु.जनजाति से जुड़े भाजपा सांसदों ने अपनी पार्टी को दलित वोटबैंक का भय दिखाकर आखिरकार बात सरकार से मनवा ली। वोटबैंक के लालच में फंसकर सरकार ने आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पहले चुनौती दी,कोर्ट दलीलों को समझ पाता उससे पहले सरकार ने लोकसभा में कोर्ट के निर्णय को बदलकर कानून को पूर्व जैसा कर दिया। यानी तत्काल गिरफ्तारी। राष्ट्रपति ने सरकार के प्रस्ताव को चुटकी में मान भी लिया। वे इसके सिवा और करते भी क्या? केंद्र सरकार राम मंदिर मामले को लेकर कोर्ट के फैसले की दुहाई देती है। वह यदि चाहे तो करोड़ों हिंदुओं की भावना और आस्था के प्रतीक रामलला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लोकसभा में नया बिल लाकर पलट सकती है? लेकिन यहां उसकी रामभक्ति मूर्छित होने लगती है। दृष्टिकोण उलट है?  एससी-एसटी एक्ट की जिस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने बदला उसे सरकार ने पहले जैसा करके निसंदेह उस वर्ग के हितों की रक्षा कर सच्चे हितैशी होने का प्रमाण दिया। लेकिन देश की आधी से अधिक आबादी को नाराज कर बैठी। भारत को सवर्ण विद्रोह की आग के हवाले करने वालों को क्या इसमें भी कोई राजनीतिक लाभ दिखाई दे रहा है? यह सवाल यहां इसलिए उठ रहे हैं क्योकि जात-पात, धर्म-समाज के नाम पर सियासत हमारे साथ हमेशा ही घिनौना खेल खेलती आई है।
हिंदुओं को दलित-सवर्ण में बांटने का कुचक्र किसलिए ? परदे के पीछे जाकर आप यदि सवर्ण विद्रोह की हकीकत समझना चाहें तो जरा गौर से समझिए।
आम चुनाव के वक्त ही दो बड़े फैसले लिए जाते हैं। पहला सुप्रीम कोर्ट की तरफ से और दूसरा केंद्र सरकार की ओर से। केंद्र सरकार पिछड़ों को साधने के लिए एक नया संवैधानिक पिछड़ा आयोग गठित करती है। तो उससे पूर्व एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आता है। जाहिर है फैसले के भावी परिणामों से कोर्ट अनभिज्ञ न रहा होगा? संभव है उसे अंदाजा रहा होगा  सियासी फायदे के लिए केंद्र सरकार उसके फैसले को पलट सकती है। वैसा हुआ भी। अब देशभर में विद्रोह की आग भड़क उठी है तो शांति बहाली के ठोस प्रयासों के लिए केंद्र सरकार को चेतावनी क्यों नहीं मिली? जैसा राम रहीम की गिरफ्तारी के दौरान बिगड़ते माहौल को काबू में करने के लिए किया गया था। वोट के लिए क्या देश को हिंसा और आग की लपटों के हवाले कर देंगे? तो फिर इसे रोकना किसकी जिम्मेदारी बनती है? धारा 144 लगा देने भर से समाधान होगा? इस पूरे मामले को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की खामोशी यहां गौर करने वाली है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की गाहे-बगाहे सुझाव देने वाला संघ मौन है, इसके पीछे कुछ वजह तो होगी। लोकतंत्र में असहमति जताने का सबको समान अधिकार है। उसकी सांसे तब तक चलेंगी जब तक सहमति-असहमति होगी। इसे छीनने का अर्थ होगा लोकतंत्र का खात्मा !  न्यायपालिका का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिशें हो रही हैं? सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कांगे्रस सरकार ने भी शाहबानों केस में बदला था। इसलिए वह कुछ कहने लायक नहीं बची। सच कहें तो सवर्णों की मांग वाजिब है,क्योंकि फर्जी मामलों का अंबार है। यह भी सच है कि एससी-एसटी कानून से दशकों से वे पीडि़त हैं। लेकिन क्या वे दलितों से अधिक पीडि़त हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि एट्रोसिटी बिल केंद्र सरकार के लिए आम चुनाव 2019 और उससे पहले इसी साल हो रहे मप्र,राजस्थान, छत्तीसगढ़ राज्य के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए फांस बनेगी या फिर ब्रम्हास्त्र साबित होगी। आप इसे समय से पूर्व आम चुनाव कराने का एक बड़ा प्रयोग भी कह सकते हैं।