कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मप्र विधानसभा चुनाव के समर में कूद पड़े हैं। चुनाव प्रचार अभियान के तौर पर देखे जा रहे उनके भोपाल दौरे से ठीक दो दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंदौर में बोहरा समुदाय के जलसे में शामिल होकर सैयदाना साहब से 2019 में होने वाले आम चुनाव के लिए इमदाद की आरजू मेन्नतें कर मुस्लिम तुस्टीकरण का तीर चला गए हैं। मुस्लिम सुमदाय की देश भर में कुल आबादी का तकरीबन 10-15 लाख वोटर बेाहरा समाज से आता है। देश में बोहरा समाज को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है, और मोदी से सैयदाना साहब के संबंधों का कहना ही क्या ...? मालवा अंचल के सबसे बड़े क्षेत्र आद्यौगिक महानगर इंदौर को प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियान के लिए सर्वप्रथम चुना तो अब राहुल गांधी भी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बड़ी रैली निकालकर रोड शो करने आ रहे हैं। राहुल ने हिंदूत्व की पैरोकार भाजपा को उसी के अंदाज में जवाब देकर मानसरोवर की यात्रा की है। ताकि अमित शाह या भाजपा का कोई भी नेता उनके साफ्ट हिंदुत्व को चुनौती न दे सके। इसके लिए कांगे्रस अध्यक्ष ने गुजरात विधानसभा चुनाव में मंदिरों में माथे खूब टेके और आगे भी उनका यह प्रयोग जारी है। कांगे्रस पार्टी को मुद्दे पर राजनीति करनी नहीं आती वरना महंगाई, पेट्रोल डीजल के आसमानी दामों,बेरोजगारी, कालाधन जैसे जन हितैषी मुद्दों से वह चाहती तो देश हिलाकर रख देती। लेकिन वह ऐसा अभी तक नहीं कर पाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बन रहे वातावरण के बावजूद कांगे्रस मोदी को कड़ी चुनौती देना तो दूर उन्हें छू तक नहीं पाई है। आखिर इसका क्या कारण है? जबकि इन्हीं मुद्दों पर भाजपा ने देश को सिर पर उठा लिया था। संसद भवन से लेकर सड़क तक भाजपा के दिग्गज नेताओं के विरोध प्रदर्शन से जनता भड़की हुई थी और बचा खुचा काम अन्ना हजारे के जनांदोलन ने कर दिखाया। जनता ने दस साल तक दिल्ली पर राज करने वाली यूपीए सरकार का पिंडदान कर डाला। जनाक्रोश का ऐसा ही वातावरण इनदिनों वर्तमान एनडीए सरकार के खिलाफ बन रहा है। जनता महंगाई से कराह रही है तो व्यापारी जीएसटी से हलाकान है।

बेराजगार युवा काम की तलाश में विह्वल हैं। हाल में एससी-एससी एक्ट संसोधन कर केंद्र सरकार ने चुनावी मास्टरस्ट्रोक खेलकर विरोधियों की नींद हराम कर दी है। देश भर के सवर्णों में केंद्र के इस कदम को लेकर वैसा ही आक्रोश दिखाई दे रहा है जैसा कभी 1990 में बीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल कमीशन मुद्दे पर था। बीपी सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी से जनता ने उतार फेंका। लेकिन मोदी सरकार को लेकर अभी ऐसी स्थिति नहीं है। पिछड़ों को खुश करने के लिए केंद्र ने पिछड़ा आयोग बनाया है। यानी सरकार जात-पात की खाई को पाटना नहीं चाहती? वोट की सियासत का चरित्र बहुत नीचे गिर चुका है। जब देश का प्रधानमंत्री खुद को नीचा या कामदार बताकर विपक्ष पर धावा बोलने लगे तो लोकतंत्र की आत्मा मरेगी नहीं तो और क्या करेगी। लेकिन सत्ता के लिए चाहे जो हथकंडे अपनाने पड़ें , नेता तैयार हैं। भाजपा के अच्छे दिन गायब हो जाते यदि विपक्ष एक शशक्त नेतृत्व देने में सक्षम होता। इसी का लाभ भाजपा को मिल रहा है और राहुल गाधी के रहते आगे भी मिलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। एक हिंदू को संसार के सामने कभी जनेऊ दिखाकर तो कभी मंदिरों में माथा टेककर या मानसरोवर की यात्रा करनी पड़े, इससे बड़ा दुर्भाग्य भला और क्या हो सकता है। लेकिन राहुल गाधी को भाजपा की चाल समझ नहीं आती। आम चुनाव की तैयारियों में लगी कांगे्रस के मुखिया का चुनाव अभियान की शुरूआत के लिए भोपाल दौरा समझ से परे है। उनका रोड शो अधिकांशत: मध्य विधानसभा क्षेत्र से होकर गुजरेगा। इससे अच्छा होता यदि उनका चुनावी शंखनाद बुंदेलखंड की धरती से होता। जहां बरसों पहले राहुल ने छटपटाते क्षेत्र को सूखे की मार झेलते कभी देखा था। बाद में उन्होने ही स्पेशल पैकेज दिलवाया। हालांकि वह भ्रस्टाचारियों की भेंट चढ़ गया। राहुल के पास बुंदेलखंड में बड़ा मुद्दा है, और सत्ताविरोधी हवा भी सबसे ज्यादा इसी क्षेत्र में चल रही है। उन्होने ऐसा क्यों नहीं सोचा? पंद्रह साल से निरंतर सत्ता सिंघासन पर सवार भाजपा के खिलाफ इस बार तीखा जनाक्रोश है, प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सवर्ण क्लास आग में जल रहा है इसी बीच एससी-एसटी एक्ट ने आग में घी उड़ेल दिया है।

कांग्रेस पार्टी के लिए 2018 विधानसभा चुनाव स्वर्णिम अवसर है, लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उसके सामने अभी भी सबसे बड़ी चुनौती हैं। कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने वोटरों को लुभाने के लिए पहली बार घोषणा पत्र की बजाय वचन पत्र तैयार किया है। भाजपा का चुनावी अस्त्र रहे राम और गाय दोनो के लिए कांगे्रस ने नई घोषणाएं की हैं। भाजपा राम को किनारे रखकर मोदी राज के विकास और शिवराज के चेहरे के भरोसे है। चुनावी मोर्चे से देखा जाए तो भाजपा मजबूत स्थिति में है। लेकिन 200 पार की स्थिति में बिल्कुल नहीं है। कांगे्रस ने कमलनाथ को आगे जरूर किया है मगर जनता में ज्योतिरादित्य सिंधिया सबसे अधिक पसंद किए जा रहे हैं। उनकी सभाओं में बिना पैसे वाली भीड़ जमकर जुट रही है। राहुल गाधी को चाहिए कि वे सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दें, तभी कांगे्रस चुनाव में भाजपा को कांटे की टक्कर दे सकती है। कमलनाथ वरिष्ठ नेता हैं लेकिन जनता उनके साथ नहीं है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह उनके मुकाबले ज्यादा असरदार हैं। 2018 के चुनाव में उनका प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा है। उनकी मेहनत से विंध्य क्षेत्र इस बार भी कांगे्रस का पलड़ा भारी है। पहली बार कांगे्रस के सभी बड़े नेता दिल से परिश्रम कर रहे हैं। वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह दिन-रात कांग्रेसियों के आगे हाथ जोड़े एकता यात्रा पर चल रहे हैं। सब जानते हैं इस बार नहीं तो फिर कभी नहीं।

मप्र का चुनाव जनता लड़ रही है। कांगे्रस से उसका भरोसा कब का उठ चुका है। वह कांगे्रस को बुझ चुकी राख का मलबा मानने लगी है। राहुल गाधी बुझी हुई राख में आग जलाने आ रहे हैं। क्या वो ऐसा कर पाएंगे? कांगे्रस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राहुल के नेतृत्व में यह दूसरा चुनावी रण है। इसलिए आम चुनाव की चिंता लिए वे मप्र,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पंजे की सरकार देखना चाहते हैं। कांगे्रस की हालत देखने में थोड़ी मजबूत हो पर ग्राउंड में है नहीं। देखने वाली बात यह होगी कि साफ्ट हिंदुत्व के दम पर राहुल खुद को देश की जनता के सामने किस तरह स्थापित कर पाते हैं। मप्र में राहुल की चुनावी सभाओं से कांगे्रस को बहुत ज्यादा लाभ नहीं होने वाला है।