मप्र में कांगे्रस पार्टी का पंद्रह साल से जारी वनवास खत्म करने की कोशिश करने भोपाल आए पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं से खचाखच भरे भेल दशहरा मैदान पर समां बांधने दम लगा दिया। दशकों बाद कांगे्रसियों का उफान राजधानी की सड़कों पर भीड़ की शक्ल में लोगों ने देखा। अपने नेता की एक झलक पाने के लिए कार्यकर्ताओं की दिवानगी निसंदेह काबिले तारीफ थी। कांगे्रस अध्यक्ष यहां संकल्प यात्रा के तहत कांगे्रसियों के आपसी गिले-शिकवे दूर करने और उनके अंदर नया जोश भरने के जिस मकसद से आए वह कितना सफल होता है यह तो चुनाव परिणामों के बाद प्रमाणित होगा लेकिन चुनावी शंखनाद में कांगे्रस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की आधी अधूरी तैयारी साफ दिखी। अपने भाषण में राहुल ने भाजपा के हिंदुत्व को चुनौती देकर यह जताने की भरपूर कोशिश की, कि कांगे्रस पार्टी हिंदुत्व की पुरानी पैरोकार है। वैसे यह बात सच है कि कांगे्रस पार्टी की हिंदुत्व के प्रति आस्था काफी पहले से रही है। अंग्रेजों के खिलाफ चलाए गए संघर्ष में हिंदू महासभा के साथ कांगे्रस नेताओं ने लड़ाई लड़ी लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांगे्रस ने खुद को एक धर्मनिरपेक्ष दल बनाने का ऐजेंडा खींच लिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनके निधन के बाद काफी समय तक उनकी पुत्री श्रीमती इंदिरा गाधी की धारणा हिंदुत्व को लेकर दृढ़ थी जो बाद में धर्म विशेष वोटबैंक के लालच में उलझ गई। इतिहास में इंदिरा और आरएसएस के प्रथम सरसंघचालक रहे गुरू गोलवलकर के सौहाद्र वार्तालाप कांगे्रस के हिंदूवाद के प्रति दृढ़ता का नमूना हैं। हालांकि मौके का लाभ उठाते हुए आरएसएस ने हिंदुत्व को अपनी मु्ठ्ठी में जकड़ लिया। जो 1925 से लेकर आज तक कायम है। अयोध्या राम मंदिर की राह को आसान बनाने के लिए कांगे्रस की नरसिंहाराव सरकार के राज में बाबरी विंध्वस कांड हुआ। रामलला मंदिर के ताले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुलवाए थे। यानी बीच-बीच में कांगे्रस ने हिंदुत्व के प्रति लार टपकाई । यह अलग बात है कि मुस्लिम वोटबैंक खिसकने के भय से उसने भाजपा की तरह छाती ठोककर इसका श्रेय कभी नहीं लिया। आज वही हिंदुत्व आरएसएस के रूप में भाजपा को दो लोकसभा सीटों से खींचकर 282 सीटों तक ले आया है।

अटलजी के बाद वर्तमान मोदीराज इसी हिंदुत्व की देन है। कांगे्रस का सेकुलिरिज्म उसे पतन की ओर ले जा रहा है। राहुल गांधी आज सेकुलिरिज्म को छोड़कर पुन: हिंदुत्व की ओर लौटने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। उन्होने यह समझ लिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या फिर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन्हें हरा पाना मुश्किल है। और यदि कोई उम्मीद बनती है तो वह है हिंदुत्व का चोला। इसी चोले को पहनकर कांगे्रस अध्यक्ष ने गुजरात चुनाव से खुद को हिंदुत्व के सांचे में ढालने की मुहिम तेज कर रखी है। उनका मंदिरों में आए दिन जाना, जनेऊ दिखाना और हाल की मानसरोवर यात्रा इसी मुहिम का हिस्सा है। राहुल जिस खानदान से आते हैं उसका डीएनए हिंदूत्व है, पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनकी मुहिम भाजपा को हिंदुत्व की काट बन पाएगी? यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि राहुल के लोहे से लोहा काटने की कला भाजपा को बेचैन किए हुए है। मप्र विधानसभा चुनाव का शंखनाद करने राहुल भोपाल आए लेकिन बिना होमवर्क किए। अपने भाषण में उन्होने प्रधानमंत्री मोदी पर जितने भी हमले किए वह जनता पहले भी सुन चुकी है। मप्र की जनता उम्मीद लगाए बैठी थी कि कांगे्रस अध्यक्ष कोई नया तीखा वज्रप्रहार कर शिवराज सरकार को कटघरे में खड़ा करेंगे। लेकिन उनका प्रहार शिवराज को सिर्फ घोषणा मशीन बताने तक सिमटकर रह गया। किसान आत्महत्या, बेरोजगारी, महिला असुरक्षा,भ्रष्टाचार जैसे शब्दों से उन्होने कांगे्रसियों की तालियां भले बंटोरी हों लेकिन आम जनमानस के मन में बसी अजेय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता की छाप खंडित नही कर पाए। मप्र में चल रहे घटनाक्रमों के बारे में उन्हें किसी ने अच्छी तरह से नहीं बताया।

राहुल को मप्र में अपने चुनाव अभियान की शुरूआत करनी ही थी तो मुरैना में खनिज माफिया द्वारा ट्रैक्टर से कुचलकर डिप्टी रेंजर की हत्या को लेकर सरकार की खिंचाई करते। न्याय मांगने संघर्षरत सरकारी कर्मचारियों को ही कोई भरोसा दिलाते। या अमेरिका से अच्छी सड़कों पर कटाक्ष करते। बुंदेलखंड पैकेज की बंदरबाट पर हमले कर सवाल पूछते। युवा बेरोजगारों के लिए ही कोई बड़ा वादा करते। पर उन्होने मप्र से जुड़े गंभीर विषयों पर कुछ ज्यादा नहीं बोला। अध्ययन की कमी इसका प्रमुख कारण है। ई टेंडरिंग, व्यपमं, रोजगार, पेट्रोल-डीजल, किसान,नोटबंदी और राफेल डील का जिक्र उन्होने जरूर किया लेकिन ऐसा कुछ नहीं कर पाए जिससे जनता भाजपा को सत्ता से बाहर करने का इरादा पालने लग जाए। जनता को तो नेता के लच्छेदार भाषण सुनने में मजा आता है, भाजपाईयों को इसमें कोई हरा नहीं सकता। दस साल मप्र के मुख्यमंत्री रहे वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को नजरंदाज किया गया, क्षत्रियों को यह नागवार क्यों नहीं लगेगा? राहुल यदि मप्र पर केद्रित भाषण देते तो जनता के और करीब जा सकते थे।

कांगे्रस का यह चुनावी शंखनाद कांगे्रसियों के लिए तो बढिय़ा जोश भरने में कारगर साबित हुआ लेकिन उन्हें पैराशूट वाली बात पर विश्वास नहीं होगा। क्योंकि पिछले चुनाव के समय भी भोपाल में दो दिन ठहरे राहुल ने टिकट के लिए ईमानदार, जिताऊ और निष्ठावान कांगे्रसियों को टिकट देने का भरोसा दिलाया था। पैरोशूट का किस्सा तब भी था लेकिन उस पर सख्ती से अमल नहीं हुआ। इस बार भी पैराशूट राईडर्स को टिकट देकर कांगे्रसियों का हक मारा जाएगा या फिर राहुल अपने वचन निभाऐंंगे? इसकी उम्मीद कम ही है। सर्वे के आधार पर टिकट बांटने का फामॅूला सही है बशर्ते उसे लागू किया जाए। राहुल की यात्रा के दौरान कांगे्रसियों के आकर्षण का केंद्र ज्योतिरादित्य सिंधिया रहे। राहुल गाधी ने उन्हें आगे रखकर जनता की नब्ज टटोली होगी। कांगे्रस का वनवास खत्म कर पाना प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष कमलनाथ के वश की बात नहीं दिखती। जनता का मन सिंधिया के लिए सकारात्मक है। यह बात नासमझ राहुल को कब समझ आएगी?

Source : राहुल