विज्ञापन की बैसाखी और पत्रकारिता ....
विजय शुक्ला -----------------------
आजकल अखबार और न्यूज़ चैनल प्रमुख रूप से दो उद्देश्यों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गए हैं।
पहला -पहुंच, पकड़, दबदबा,उगाही
दूसरा- सरकारी विज्ञापन,चाटूकारिता
बावजूद अपवादस्वरूप कुछ ऐसे भी हैं जिनका उद्देश्य इनसे अलग हो। पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से आए महानुभावों के कारण पत्रकारिता आज थोड़ी शुद्व, सुरक्षित है और उसकी सांस चल रही है। वरना पत्रकारिता क्षेत्र में गैर पत्रकारों की बाढ़ सी आ गई है। मस्का,चश्का बिस्कुट सरीखे ऐसे तथाकथित लोग पत्रकारों के बीच जबरन घुसे बैठे हैं। प्रेसवार्ता के दौरान इनके द्वारा पूछे जाने वाले अनाप शनाप सवालों से इन्हें कोई भी आसानी से पहचान सकता है। दुकानदारी ,व्यवसायी संस्थानों को
थोड़ी बहुत जन पक्षधर पत्रकारिता का दिखावा इसलिए करना होता है क्योंकि उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिए नौटंकी भी तो जरूरी है। वरना जनता अखबारों, टीवी चैनलों की तरफ क्यों झांकेंगी। मीडिया की आड़ में आद्योगिक, व्यापारिक प्रतिष्ठान धड़ल्ले से चल रहे हैं। अफसोस इस बात का है कि ऐसे संस्थानों को सरकार विज्ञापनों से पाट रही है। जिन्हें विज्ञापनों की आवश्यकता नहीं है। दरअसल, ऐसा इसलिए है क्योंकि ये सरकार-प्रशासन से बचने के लिए मीडिया की दुकान खोलकर बैठे हैं। ताकि सड़क,बिल्डिंग, तेल,फैक्ट्री, ठेकेदारी चलती रहे। कोई उनकी तरफ न देखे। पत्रकारिता को सबसे अधिक नुकसान ऐसी ही पूंजीवादी ताकतों से हो रहा है। इसी ताकत ने प्रेस को पत्रकारिता के लिए नहीं वरन अपनी स्वार्थसिद्धि का प्रमुख औजार बना लिया गया है। देश,समाज,व्यक्ति से इन्हें कभी लेना देना था ही नहीं। बेचारे विशुद्ध पत्रकार पिसे जा रहे हैं। केंद्र या राज्य सरकारों को क्या पता नहीं कि पत्रकार पूंजीपति और पूंजीवादी कभी पत्रकार नहीं हो सकता। आवश्यकता इस बात की है कि विशुद्ध रूप से पत्रकारिता करने वाले लघु,मध्यम मीडिया संस्थानों को सहायता प्रदान की जाए। केन्द्र सरकार ने इतने कड़े नियम कायदे बना दिये हैं जिसे कारपोरेट घराने ही पूरा कर सकते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। केन्द्र सरकार की नीतियां मध्यम-लघु अखबारों के प्रति थोड़ी लचीली उदारतापूर्वक होनी चाहिये। यहां पर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना विशेष रूप से करनी पड़ेगी जिन्होंने विशुद्ध पत्रकारों के के प्रति हमेशा से ही उदारता दिखाई है। वर्तमान मोहन सरकार एवं छत्तीसगढ़ की साय सरकार का रवैया पत्रकार हितेषी है। केन्द्र भी इस बारे में विचार करे।
जनता तो चाहती है पत्रकार उसके पक्ष में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे लेकिन जब अखबार खरीदकर पढ़ने की बारी आती है तो वही जनता मुंह फेर लेती है। जनता चाहती है अखबार सिस्टम को धूल चटा दे उसकी ही सुने लेकिन जब पत्रकार या अखबार पर कोई संकट आ जाए तो पाठक चुप। पाठकों के दोहरे चरित्र से स्वस्थ पत्रकारिता की कल्पना कैसे की जाए। सच तो यह है कि सरकारी विज्ञापन बन्द कर दिए जाएं तो 99 फीसदी मीडिया पर ताले लग जाएं। पाठक अखबारों को चलाने का जिम्मा कभी नहीं उठा सकते। वे एक दिन में बीस रुपये एक गुटखे के पाउच के लिए खर्च कर देंगे लेकिन अखबारों को पढने के लिए 30 दिन में 50 रुपये नहीं देंगे। युवा पीढ़ी ने अखबारों को पढ़ना बन्द सा कर दिया है। क्योंकि उनके मन के विषय नहीं दिए जा रहे हैं। इस बारे में शोध जरूरी है। मेरा निजी मत है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता कभी न बने बल्कि स्वतंत्र होकर निडरता, निष्पक्षता से कार्य करती रहे यही देश हित मे रहेगा। अंत में एक खास बात - सरकारें पत्रकारिता की दुश्मन कभी नहीं होतीं बल्कि हमारी लेखन की सोच और नीयत इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। मीडिया विपक्ष को अपनी भूमिका निभाने दे और वह अपनी भूमिका का निष्पक्षता, समदर्शिता,सत्यता और शोध से निर्वहन करे। वह सरकार और सिस्टम की आंखे खोले ,अपने सुझाव दे। सबकुछ खराब है यह एकतरफा सोच रखने से ही पत्रकारिता पर पहरे लगने लगते हैं। सरकार की अच्छाइयों को भी समाज के सामने रखनी चाहिए। ऐसा नहीं कि केवल निगेटिव खबरें । समाज में अच्छे कार्यों को भी स्थान दे। नेताओं के इन्टरव्यू हों लेकिन अंतिम पंक्ति में बैठे होनहार व्यक्ति के योगदान पर भी चर्चा हो। अधिकारों की चिन्ता में कर्तव्यों को बिसराना ठीक नहीं है। चमक दमक की होड़ में व्यवहार न भूलें।
( लेखक विजय मत समाचार पत्र समूह के प्रधान सम्पादक हैं। )
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