ग्वालियर| देश के छोटे-बड़े शहरों में ई-रिक्शों की अनियंत्रित संख्या और उसकी वजह से लगने वाले लंबे ट्रैफिक जाम से राहत दिलाने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को कड़ा आदेश जारी करते हुए कहा है कि सड़कों पर अव्यवस्थित ढंग से चल रहे ई-रिक्शा के संचालन के लिए अगले 60 दिनों के भीतर एक व्यापक राष्ट्रीय नीति (नेशनल पॉलिसी) तैयार की जाए।

प्रस्तावित राष्ट्रीय नीति में क्या होंगे मुख्य प्रावधान?

न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, नई नीति में ई-रिक्शा संचालन को लेकर मुख्य रूप से तीन अहम बिंदु तय किए जाएंगे:

  • संख्या निर्धारण: किसी भी शहर की आबादी, भौगोलिक स्थिति और सड़क की चौड़ाई के हिसाब से यह तय होगा कि वहां कुल कितने ई-रिक्शा चलाए जा सकते हैं।

  • रूट का आवंटन: सभी ई-रिक्शा चालकों के लिए निश्चित मार्ग (रूट) निर्धारित किए जाएंगे। जिस चालक को जिस रूट का परमिट मिलेगा, वह केवल उसी तय सीमा में वाहन चला सकेगा।

  • रूट परमिट व्यवस्था: परमिट प्रणाली लागू होने से किसी एक मुख्य मार्ग या चौराहे पर अनावश्यक भीड़ एकत्रित नहीं होगी और संपूर्ण शहर में यातायात का संतुलन बना रहेगा।

नियमों के अभाव में बढ़ रही अव्यवस्था: हाई कोर्ट

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की पीठ ने निशा गुर्जर द्वारा दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि पिछले एक दशक से ई-रिक्शा का चलन बढ़ा है, लेकिन कोई स्पष्ट नियमावली न होने से जाम और दुर्घटनाओं की समस्या गंभीर हो गई है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि नियमानुसार परमिट और शुल्क चुकाकर चलने वाले अन्य व्यावसायिक वाहन चालकों पर भी इसका विपरीत असर पड़ रहा था।

मध्य प्रदेश में 120 दिनों के भीतर लागू करने के आदेश

अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि इस नीति को 120 दिनों के भीतर राज्य में अनिवार्य रूप से लागू किया जाए। हालांकि, राज्य सरकार को अपनी स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और आबादी की आवश्यकताओं के अनुसार नीति में आवश्यक बदलाव करने की छूट दी गई है। ग्वालियर पीठ के निर्देशानुसार, केंद्र सरकार द्वारा 60 दिनों के भीतर तैयार नीति को देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पालन हेतु भेजा जाएगा।